मानव शरीर की विभिन्न ग्रंथियाँ (Human Glands in Hindi) एवं उनके कार्य

मानव शरीर की रचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई कोशिकाएं होती हैं, जो समूहों में विभिन्न ऊतकों का निर्माण करती हैं तथा इनसे मानव शरीर के विभिन्न छोटे बड़े अंगों का निर्माण होता है। अलग अलग अंग मिलकर शरीर के विभिन्न तंत्रों (Human Glands in Hindi) का निर्माण करते हैं तथा प्रत्येक तंत्र शरीर में किसी विशेष क्रिया के संचालन के लिए उत्तरदायी होता है।

उदाहरण के तौर पर रक्त प्रवाह के लिए परिसंचरण तंत्र, शरीर में गैसों का आदान-प्रदान एवं ऊर्जा के लिए श्वसन तंत्र तथा भोजन को पचाकर उससे जरूरी पोषक तत्वों को निकालने के लिए पाचन तंत्र आदि। इन तंत्रों के अंतर्गत ही अन्तःस्रावी प्रणाली (Human Glands in Hindi) भी शामिल है, जिसके बारे में आज इस लेख में चर्चा करेंगे। जानेंगे इस तंत्र का हमारे शरीर में क्या कार्य है तथा इसके अंतर्गत कौन कौन से अंग शामिल हैं।

ग्रंथियाँ तथा इनसे निकलने वाले रसायन

ग्रंथियाँ अथवा Glands मानव शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में शामिल हैं। ये शरीर में विभिन्न प्रकार के रसायनों (हार्मोन तथा एंजाइम) अथवा तरल पदार्थों का स्राव करती हैं, जो किसी अंग को किसी कार्य विशेष को करने के लिए प्रेरित अथवा उत्तेजित करता है। इन रसायनों के प्रभाव में ही हमारा शरीर किसी परिस्थिति विशेष में आवश्यक प्रतिक्रिया कर पाता है।

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हार्मोन : हार्मोन एक प्रकार के रसायन हैं, जिन्हें विभिन्न ग्रंथियों द्वारा रक्त में स्रावित किया जाता है तथा रक्त के प्रवाह में ये रसायन शरीर के विभिन्न हिस्सों तक संदेश ले जाने का कार्य करते हैं। इन्हें शरीर का संदेशवाहक भी कहा जा सकता है। हार्मोन्स ही हमारे शरीर के विकास, मेटाबॉलिज्म, प्रजनन आदि क्रियाओं के लिए उत्तरदाई होते हैं। इसके अतिरिक्त हमारे प्रत्येक भाव जैसे गुस्सा आना, घबराहट होना, प्यार आना आदि के लिए भी हार्मोन्स ही जिम्मेदार हैं। बहुत कम मात्रा में स्रावित होने वाले ये रसायन शरीर में बहुत बड़े परिवर्तन लाने में सक्षम होते हैं।

हार्मोन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द Hormao से हुई है जिसका अर्थ होता है “मैं उत्तेजित करता हूं” अपने नाम के अनुरूप प्रत्येक हार्मोन शरीर के एक विशेष हिस्से को उत्तेजित करता है। हार्मोन का निर्माण अंतःस्रावी ग्रंथियों में होता है और ये ग्रंथि की कोशिकाओं से सीधे रक्त में मिल जाते हैं।

एंजाइम : एन्जाइम्स की बात करें तो ये अलग अलग प्रकार के रसायन होते हैं, जो हमारे शरीर में होने वाली कई रासायनिक क्रियाओं जैसे भोजन को पचाने आदि को तेज कर देते हैं। दूसरे शब्दों में ये किसी उत्प्रेरक की भाँति कार्य करते हैं। एंजाइम ही शरीर में मौजूद जटिल अणुओं को ग्लूकोज जैसे छोटे अणुओं में तोड़ने में मदद करते हैं, जिसे शरीर ईंधन के रूप में उपयोग कर पाता है।

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ग्रंथियों के प्रकार (Types Of Glands)

हमारे शरीर में पाई जाने वाली समस्त ग्रंथियाँ (Human Glands in Hindi) गुणों के आधार पर दो प्रकार की होती हैं, जिनमें अंतस्रावी ग्रंथियाँ एवं बाह्य स्रावी ग्रंथियाँ शामिल हैं। अंतःस्रावी ग्रंथियाँ वे होती हैं, जो विभिन्न प्रकार के हार्मोन्स का स्राव करती हैं। ये ग्रंथियाँ नलिकाविहीन होती हैं, अतः यह स्रावित होने वाले हार्मोन्स को सीधे रक्त में स्रावित करती हैं, इसके प्रमुख उदाहरणों में पीयूष ग्रंथि, थाइरॉइड ग्रंथि आदि शामिल हैं। वहीं बाह्य स्रावी ग्रंथियों की बात करें तो यह शरीर में विभिन्न एन्जाइम्स को स्रावित करती हैं, जो शरीर की उपापचय क्रियाओं के लिए बेहद आवश्यक होते हैं। विभिन्न अंतःस्रावी ग्रंथियाँ मिलकर अंतःस्रावी तंत्र का निर्माण करती हैं।

अंतस्रावी ग्रंथियों के प्रकार एवं उनके कार्य

अंतःस्रावी ग्रंथियाँ 9 प्रकार की होती हैं।

पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland)

पीयूष ग्रंथि सभी ग्रंथियों में सबसे अहम है, शरीर के महत्वपूर्ण कार्यों को विनियमित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। यह शरीर की आवश्यकताओं को महसूस कर शरीर के विभिन्न अंगों और ग्रंथियों को उनके कार्य को विनियमित करने एवं शरीर के लिए एक उपयुक्त वातावरण बनाए रखने के लिए संकेत भेजती है। चूँकि यह शरीर की अन्य ग्रंथियों को भी नियंत्रित करती है अतः इसे मास्टर ग्रंथि कहा जाता है।

इसकी अवस्थिति को देखें तो, यह हमारे कपाल के स्फेनॉइड हड्डी में स्थित गड्ढेनुमा संरचना में उपस्थित होती है, यह आकार में बहुत छोटी लगभग मटर के दाने के समान होती है। पीयूष ग्रंथि के दो भाग हैं, Anterior  Pituitary gland एवं Posterior Pituitary gland दोनों भाग अलग अलग हार्मोन्स को स्रावित करते हैं। आइए अब इस ग्रंथि द्वारा स्रावित किए जाने वाली हार्मोन्स तथा उन हार्मोन्स के कार्यों पर एक नजर डालते हैं।

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Adrenocorticotrophic hormone (ACTH) : एड्रेनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हॉर्मोन अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland) को स्टेरॉइड हार्मोन (मुख्यतः कॉर्टिसॉल) स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है। कॉर्टिसॉल को शरीर के अलार्म सिस्टम के रूप में भी जाना जाता है। यह शरीर का मुख्य तनाव हार्मोन है। कॉर्टिसॉल हमारे भाव, प्रेरणा तथा डर को नियंत्रित करने के लिए मस्तिष्क के कुछ हिस्सों के साथ काम करता है।

शरीर में कॉर्टिसॉल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के तौर पर, यह शरीर में कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन के उपयोग को प्रबंधित करता है, रक्तचाप को नियंत्रित करता है, रक्त शर्करा (ग्लूकोज) को बढ़ाता है और हमारी नींद को नियंत्रित करता है। पीयूष ग्रंथि रक्त में कॉर्टिसॉल की मात्रा (कम या अधिक) के आधार पर अधिवृक्क ग्रंथि को इस हार्मोन को स्रावित करने के लिए उत्तेजित करती है।

Thyroid-stimulating hormone (TSH) : यह हार्मोन थाइरॉइड ग्रंथि को थाइरॉक्सिन हार्मोन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है। थाइरॉक्सिन हार्मोन शरीर की मेटाबॉलिज्म दर, हृदय और पाचन कार्यों, मांसपेशियों पर नियंत्रण, मस्तिष्क के विकास और हड्डियों के रखरखाव को विनियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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Luteinizing hormone (LH) : यह हार्मोन प्रजनन तंत्र के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, महिलाओं में अंडाशय एवं पुरुषों में वृषण के कार्यों को यही विनियमित करता है। इस हार्मोन को ल्यूट्रोपिन और इंटरस्टीशियल सेल उत्तेजक हार्मोन भी कहा जाता है।

Follicle-stimulating hormone (FSH) : यह हार्मोन यौन विकास एवं संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। महिलाओं में यह हार्मोन मासिक धर्म चक्र को नियंत्रित करता है और अंडाशय में अंड कोशिकाओं के विकास को प्रेरित करता है। वहीं पुरुषों में FSH शुक्राणु के उत्पादन को नियंत्रित करने में मदद करता है। महिलाओं में यह अंडाशय को एस्ट्रोजन हार्मोन बनाने और पुरुषों में वृषण को टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बनाने के लिए उत्तेजित करता है।

Prolactin (PRL) : प्रोलैक्टिन महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान और शिशु के जन्म के पश्चात स्तनों को बढ़ाने एवं दुग्ध निर्माण के लिए उत्तरदाई होता है। गर्भवती महिलाओं में प्रोलैक्टिन हार्मोन का स्तर सामान्य से अधिक होता है।

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Growth hormone (GH) : ग्रोथ हार्मोन या ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन पीयूष ग्रंथि द्वारा निर्मित हार्मोन है, जो बच्चों और किशोरों में वृद्धि तथा विकास को बढ़ावा देता है। यह शरीर की संरचना, तरल पदार्थ, मांसपेशियों और हड्डियों के विकास एवं शुगर और वसा चयापचय को विनियमित करने में भी मदद करता है। मानव शरीर में इसका स्तर बाल्यकाल में उत्तरोत्तर बढ़ता है तथा यौवन के दौरान चरम पर होता है। यह प्रोटीन संश्लेषण को उत्तेजित करता है तथा ऊतकों की वृद्धि हेतु आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने के लिए वसा के टूटने को बढ़ाता है।

Melanocyte-stimulating hormone (MSH) यह हार्मोन हमारी त्वचा को पराबैंगनी किरणों से बचाने, रंजकता अथवा रंग के विकास एवं भूख को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। त्वचा, बालों, आंखों आदि के विशिष्ट रंग के लिए यही हार्मोन उत्तरदाई होता है। मेलानोसाइट्स के रूप में जानी जाने वाली विशिष्ट त्वचा कोशिकाएं मेलेनिन का उत्पादन करती हैं, जो कोशिकाओं को त्वचा के कैंसर से बचाने में मदद करता है। मेलेनिन की अधिक एवं कम मात्रा ही हमारे शरीर के रंग का निर्धारण करती है।

विषुवत रेखा के आस-पास रहने वाले लोगों का रंग अत्यधिक काला होता है, ऐसा उनके शरीर में अधिक मेलेनिन के कारण होता है, चूँकि इस क्षेत्र में सूर्य से आने वाली परबैगनी किरणों की तीव्रता ध्रुवों के मुकाबले अधिक होती है, जिसके कारण यहाँ निवास करने वाले लोगों के शरीर में अधिक मेलेनिन बनने लगता है।

इसके अतिरिक्त दो हार्मोन हाइपोथैलेमस (मस्तिष्क का पिछला हिस्सा) द्वारा निर्मित होते हैं और फिर रक्तप्रवाह में स्रावित होने से पहले पश्च या Posterior Pituitary ग्रंथि में संग्रहित हो जाते हैं। ये हार्मोन वैसोप्रेसिन तथा ऑक्सीटोसिन हैं। वैसोप्रेसिन हार्मोन शरीर में पानी के संतुलन और रक्तचाप के नियंत्रण में अहम योगदान देता है, जबकि ऑक्सीटोसिन प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन तथा स्तनपान के दौरान दूध के स्राव को उत्तेजित करता है।

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यदि किसी व्यक्ति की पीयूष ग्रंथि, हार्मोन्स का पर्याप्त मात्रा में उत्पादन नहीं कर रही हो, तो इस स्थिति को हाइपोपिट्यूटारिज्म कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर यदि ग्रंथि कुछ हार्मोन का अधिक उत्पादन करने लगे तो यह स्थिति हाइपरपिट्यूटारिज्म कहलाती है।

थाइरॉइड ग्रंथि (Thyroid Gland)

थाइरॉइड ग्रंथि अथवा अवटु ग्रंथि हमारी श्वाश नली के दोनों तरफ लैरिंक्स (स्वर यंत्र) में स्थित होती है। यह ग्रंथि थाइरॉक्सिन हार्मोन का उत्पादन एवं स्राव करती है, जो शरीर की चयापचय दर को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है। इसके कार्यों को हमनें ऊपर भी बताया है, इसके अतिरिक्त यह हार्मोन शरीर के तापमान को भी नियंत्रित करने का कार्य करता है। थाइरॉइड ग्रंथि पीयूष ग्रंथि द्वारा TSH हार्मोन के स्रावित होने के कारण थाइरॉक्सिन हार्मोन का स्राव करती है।

थाइरॉक्सिन (T4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) हार्मोन्स को सामूहिक रूप से थाइरॉइड हार्मोन कहा जाता है। थाइरॉइड ग्रंथि उच्च सक्रिय T3 का सिर्फ 20% उत्पादन करती है, जबकि T4 का 80% उत्पादन करती है। एक बार थायरॉइड ग्रंथि द्वारा स्रावित होने के पश्चात लीवर एवं किडनी आदि के ऊतकों में मौजूद विशिष्ट एंजाइम T4 को सक्रिय हार्मोन T3 में बदल सकते हैं।

थाइरॉइड ग्रंथि द्वारा थाइरॉक्सिन का बहुत अधिक अथवा कम मात्रा में स्रावित होने से स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यदि किसी व्यक्ति का शरीर बहुत अधिक थाइरॉक्सिन स्रावित करता है, तो यह स्थिति थायरोटोक्सीकोसिस नामक समस्या को पैदा करती है, जो गण्डमाला (घेंघा रोग) का कारण बन सकता है। इसके अतिरिक्त थाइरॉक्सिन का निम्न स्तर शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है।

पैराथाइरॉइड ग्रंथि (Parathyroid Gland)

पैराथाइरॉइड अथवा परावटु ग्रंथि, थाइरॉइड ग्रंथि (Human Glands in Hindi) के पिछले हिस्से में पाई जाती है। यह मुख्यतः दो विभिन्न हार्मोन्स PTH एवं कैल्सीटोनिन का स्राव करती है, जो शरीर में कैल्शियम एवं फ़ॉस्फोरस की मात्रा को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं। पैराथाइरॉइड हार्मोन या PTH रक्त में कैल्शियम की कमी होने पर स्रावित होता है, यह कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाता है तथा अस्थियों के अनावश्यक भाग को गलाकर रक्त में कैल्शियम एवं फ़ॉस्फोरस मुक्त करता है। इसके अलावा कैल्सीटोनिन हार्मोन रक्त में कैल्शियम की अधिकता होने पर स्रावित होता है और मूत्र में कैल्शियम के उत्सर्जन को बढ़ता है।

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अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland)

त्रिभुज के आकार की यह ग्रंथि प्रत्येक वृक्क या किडनी के ऊपरी सिरे पर अंदर की ओर मौजूद होती है। अधिवृक्क ग्रंथियाँ हार्मोन का उत्पादन करती हैं, जो शरीर के चयापचय, प्रतिरक्षा प्रणाली, रक्तचाप, तनाव की प्रतिक्रिया और अन्य आवश्यक कार्यों को विनियमित करने में मदद करते हैं। अधिवृक्क ग्रंथियां दो भागों जिन्हें कॉर्टेक्स तथा मेड्यूला कहा जाता है से बनी होती हैं, प्रत्येक भाग अलग-अलग हार्मोन का उत्पादन करता है।

कॉर्टेक्स से स्रावित होने वाले हार्मोन

कॉर्टिसॉल हार्मोन : कॉर्टेक्स हिस्से से निकलने वाले हार्मोन में सबसे महत्वपूर्ण कॉर्टिसॉल हार्मोन है, यह पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित ACTH हार्मोन के कारण स्रावित होता है तथा शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों में अपनी भूमिका निभाता है। उदाहरण के तौर पर यह शरीर द्वारा वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट के उपयोग को नियंत्रित करने में मदद करता है, सूजन को कम करता है, रक्तचाप को नियंत्रित करता है तथा रक्त शर्करा बढ़ाता है।

Aldosterone : यह हार्मोन शरीर में रक्तचाप तथा इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम और पोटेशियम) को नियंत्रित करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। एल्डोस्टेरोन हमारे गुर्दों को संकेत भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप गुर्दे रक्तप्रवाह में अधिक सोडियम अवशोषण करने लगते हैं और मूत्र द्वारा पोटेशियम को बाहर छोड़ते हैं। इस प्रकार एल्डोस्टेरोन हार्मोन रक्त में इलेक्ट्रोलाइट्स के स्तर को नियंत्रित करके रक्त के पीएच मान को नियंत्रित करता है।

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DHEA and Androgenic Steroids : हालाँकि इसकी उपयोगिता को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है, लेकिन यह महिलाओं में एस्ट्रोजेन और पुरुषों में एण्ड्रोजन के संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मेड्यूला से स्रावित होने वाले हार्मोन

अधिवृक्क ग्रंथि का आंतरिक भाग अधिवृक्क मेड्यूला द्वारा स्रावित मुख्य हार्मोन में एपिनेफ्रीन (एड्रेनलीन) और नोरएपिनेफ्रीन (नॉरएड्रेनलीन) शामिल हैं। अधिवृक्क ग्रंथि इन्हें सामान्यतः तनाव तथा किसी अन्य शारीरिक असंतुलन की स्थिति में स्रावित करती है।

एपिनेफ्रीन : सामान्यतः जब हमारा मस्तिष्क किसी खतरे को महसूस करता है, तब हाइपोथैलमस अधिवृक्क ग्रंथि को रक्त प्रवाह में एपिनेफ्रीन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है। यह हार्मोन हृदय, फेफड़े, मांसपेशियों और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करता है। रक्तप्रवाह में इसके स्रावित होने से हृदय गति में वृद्धि, रक्त प्रवाह में वृद्धि, तेजी से सांस लेना, रक्त शर्करा के स्तर में वृद्धि एवं शारीरिक शक्ति में वृद्धि जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

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नॉरपेनेफ्रिन : अधिवृक्क ग्रंथियों द्वारा नोरएपिनेफ्रीन हार्मोन तनाव एवं रक्तचाप के कम होने की स्थिति में स्रावित किया जाता है। यह हार्मोन सोने एवं जागने के चक्र को नियंत्रित करता है तथा हमारे ध्यान केंद्रित करने की शक्ति को बेहतर करता है।

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अग्न्याशय (Pancreas)

अग्न्याशय पेट तथा छोटी आंत के साथ स्थित एक बड़ी ग्रंथि है। यह एकमात्र ग्रंथि है जो अंतःस्रावी एवं बाह्य स्रावी दोनों प्रकार की ग्रंथियों का कार्य करती है। अग्न्याशय शरीर में दो महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वहन करता है, पहला भोजन के पाचन में सहायता करने के लिए एंजाइम का उत्पादन तथा दूसरा रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने के लिए दो अलग-अलग हार्मोन ग्लूकागॉन और इंसुलिन का उत्पादन ये दोनों हार्मोन एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं।

अग्न्याशय भोजन को पचाने के लिए पाचक रस बनाता है, जिसमें शक्तिशाली एंजाइम होते हैं। ये एंजाइम भोजन को तोड़ने और पचाने के लिए छोटी आंत में छोड़े जाते हैं। वहीं हार्मोन की बात करें तो जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है, तो अग्न्याशय द्वारा इंसुलिन हार्मोन स्रावित किया जाता है। इंसुलिन हमारे रक्त में शर्करा के स्तर को कम करता है और उसे वसा, मांसपेशियों, यकृत और शरीर के अन्य ऊतकों में ‘संग्रहित’ करता है जहाँ आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग ऊर्जा के लिए किया जाता है।

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रक्त में ग्लूकोज एक नियंत्रित मात्रा में रहना आवश्यक है, ताकि सभी कोशिकाओं तक ऊर्जा निर्माण के लिए ईंधन की आपूर्ति की जा सके इसकी कम या अधिक मात्रा शरीर के लिए नुकसानदेह होती है।

अग्न्याशय मुख्य रूप से अल्फा एवं बीटा कोशिकाओं में विभाजित होता है, ये दोनों अलग अलग हार्मोन को स्रावित करती हैं। अल्फा कोशिकाओं द्वारा ग्लूकागॉन हार्मोन का उत्पादन किया जाता है। ग्लूकागॉन रक्त में ग्लूकोज की कमी होने पर ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में परिवर्तित करता है। इसके अलावा ग्लूकागॉन ट्राइग्लिसराइड्स को भी ग्लूकोज में बदलता है और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ाने के लिए वसा ऊतक को उत्तेजित करता है।

अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं द्वारा इंसुलिन हार्मोन निर्मित किया जाता है। इंसुलिन ग्लूकोज को रक्तप्रवाह के माध्यम से पूरे शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करता है, जहाँ इसका उपयोग ऊर्जा के लिए ईंधन के तौर पर किया जाता है। यह हार्मोन भोजन के बाद यकृत, मांसपेशियों और वसा ऊतकों द्वारा ग्लूकोज के अवशोषण को उत्तेजित करता है और रक्त शर्करा के स्तर को कम करता है। इंसुलिन ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में परिवर्तित कर उसे मांसपेशियों एवं यकृत में संग्रहीत करता है।

क्या है मधुमेह रोग?

वर्तमान समय में भागती-दौड़ती ज़िंदगी तथा असंतुलित जीवनशैली के चलते मधुमेह अथवा Diabetes रोग बहुत ही सामान्य बीमारी हो चुकी है, केवल भारत में मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या 8 करोड़ से अधिक है। यह रोग मुख्यतः दो प्रकार का होता है। पहला ‘टाइप 1 मधुमेह‘, इसमें शरीर में इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और शरीर स्वाभाविक रूप से इंसुलिन का उत्पादन करने में सक्षम नहीं रहता। इसके चलते शरीर द्वारा रक्त से अतिरिक्त ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में परिवर्तित करना संभव नहीं हो पाता और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा लगातार बढ़ते रहती है।

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चूँकि टाइप 1 मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति का अग्न्याशय इंसुलिन हार्मोन का उत्पादन नहीं कर पाता, परिणामस्वरूप कोशिकाओं तक आवश्यक ग्लूकोज नहीं पहुँच पाता, ऐसे में शरीर को लगता है, कि वह भूखा है और शरीर अधिक शुगर को रक्त में छोड़ने का हर संभव प्रयास करता है। रक्त में अत्यधिक शुगर कई समस्याओं जैसे निर्जलीकरण, वजन कम होना, त्वचा संबंधित समस्याएं, आँखों, गुर्दे एवं हृदय की नसों और छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान और यहाँ तक कि दिल के दौरे का भी कारण बनता है।

मधुमेह का दूसरा प्रकार है ‘टाइप 2 मधुमेह‘ लगभग 90 फीसदी मधुमेह रोगी इसी श्रेणी के होते हैं। टाइप 2 मधुमेह में रोगी की कोशिकाएं इंसुलिन का पर्याप्त रूप से प्रयोग नहीं कर पाती हैं, लिहाजा कोशिकाओं तक आवश्यक ग्लूकोज नहीं पहुँच पाता है, और अग्न्याशय और अधिक इंसुलिन का उत्पादन करने लगता है। आवश्यकता से अधिक कार्य करने के चलते एक समय के बाद अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता, जिसके चलते रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है।

पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland)

पीनियल ग्रंथि मस्तिष्क में एपिथेलेमस नामक क्षेत्र में स्थित होती है। यह ग्रंथि मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव करती है। मेलाटोनिन हार्मोन शरीर की दैनिक घड़ी को नियंत्रित करता है और इसलिए मेलाटोनिन का उपयोग आमतौर पर मानव अनुसंधान में शरीर के जैविक समय को समझने के लिए किया जाता है। मेलाटोनिन हमारे शरीर को यह जानने में मदद करता है, कि सोने और जागने का समय कब है। इसके इस गुण के चलते इसे अंतःस्रावी घड़ी और अंतःस्रावी कैलेंडर दोनों के रूप में जाना जाता है।

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अंडाशय (Ovaries)

अंडाशय महिला प्रजनन प्रणाली का अहम हिस्सा है। प्रत्येक महिला में दो अंडाशय होते हैं। इनके द्वारा प्रजनन हार्मोन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का उत्पादन किया जाता है। प्रोजेस्टेरोन हार्मोन महिलाओं में मासिक धर्म, गर्भावस्था तथा प्रजनन क्षमता बनाये रखने के लिए उत्तरदाई है, वहीं एस्ट्रोजन महिलाओं की शारीरिक विशेषताओं के विकास तथा प्रजनन प्रणाली को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

वृषण (Testes)

वृषण अथवा अंडकोष पुरुष प्रजनन तंत्र का भाग है। यह टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का उत्पादन करता है, जो पुरुष विशेषताओं के विकास के लिए जिम्मेदार है, उदाहरण के तौर पर चेहरे के बालों का बढ़ना, आवाज का भारी होना और यौवन (Puberty) के दौरान होने वाले अन्य बदलाव। यौवन के पश्चात टेस्टोस्टेरोन हार्मोन शुक्राणु उत्पादन के लिए मुख्य उत्तेजना प्रदान करता है।

थाइमस ग्रंथि (Thymus Gland)

थाइमस ग्रंथि हमारे शरीर में छाती के ऊपरी भाग में स्थित होती है। यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है। थाइमस ग्रंथि टी-लिम्फोसाइट्स नामक श्वेत रक्त कोशिकाओं का निर्माण करती है, जो संक्रमण से शरीर का बचाव करती हैं। यह ग्रंथि नवजात बच्चों में सबसे बड़ी होती है तथा उम्र बढ़ने के साथ सिकुड़ने लगती है।

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बाह्य स्रावी ग्रंथियाँ

बाह्य स्रावी ग्रंथियों को स्रावित होने के लिए नलिकाओं की आवश्यकता होती है। इन ग्रंथियों के उदाहरणों में पसीने की ग्रंथियां, अश्रु ग्रंथियां, लार ग्रंथियां, स्तन ग्रंथियां और पेट, अग्न्याशय और आंतों में स्थित पाचन ग्रंथियां शामिल हैं।

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External Sources : Mayo Clinic

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