क्या हैं आनुवंशिक रूप से संशोधित करी गई फसलें? (Genetically Modified Crops in Hindi)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे विषयों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। आज इस लेख में हम बात करेंगे आनुवांशिक रूप से संशोधित या GM फसलों (Genetically Modified Crops in Hindi) के बारे में तथा समझेंगे आनुवांशिक रूप से संशोधित की गई फसलों के विभिन्न फ़ायदों को।

जीन (Gene)

आनुवांशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने में आनुवांशिक पदार्थ डीएनए की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डीएनए अनेक छोटे-छोटे जीन से मिलकर बना होता है तथा प्रत्येक जीन शरीर के किसी विशिष्ट लक्षण के लिए उत्तरदायी होता है। जीन को आनुवांशिकता की इकाई कहा जाता है।

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जीन अभियांत्रिकी (Genetic Engineering)

जीन अभियांत्रिकी एक ऐसी तकनीक है, जिसके द्वारा किसी जीव के किसी विशिष्ट लक्षण में सुधार लाने के उद्देश्य से उस विशिष्ट लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन में कृत्रिम तरीकों से परिवर्तन किया जाता है। इसे एक उदाहरण की सहायता से समझा जा सकता है।

माना किसी पौधे A को कोई खास किस्म की कीट अत्यधिक नुकसान पहुँचाती है, जबकि अन्य पौधे B को उस कीट से कोई नुकसान नहीं है। इसका कारण यह है कि, पौधे B के जीनोम में एक खास किस्म का जीन है, जो उस कीट के लिए एक विषाक्त प्रोटीन का निर्माण करता है, फलस्वरूप पौधा B उस कीट से सुरक्षित रहता है।

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अब यदि पौधे B के उस जीन की पहचान कर उसे पौधे A के जीनोम में प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो पौधे A में भी उस विषाक्त प्रोटीन का निर्माण होने लगेगा और उसे उस कीट द्वारा होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा। इस प्रकार जीन द्वारा जीवों में वांछित लक्षणों को प्राप्त करना संभव है।

इस तकनीक के अनुप्रयोगों की बात करें तो असाध्य आनुवांशिक रोगों का इलाज, आनुवांशिक रूप से संशोधित फसलें, उन्नत किस्म के पशुओं का विकास आदि प्रमुख हैं। इस लेख में हम केवल आनुवांशिक रूप से संशोधित फसलों की बात करेंगे जिसमें उत्पादन में वृद्धि, कीट प्रतिरोधक क्षमता का विकास, पोषण स्तर में सुधार अथवा नए फसल उत्पादों की प्राप्ति आदि शामिल है। जीन अभियांत्रिकी की सहायता से इन सब उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है।

कीट प्रतिरोधक क्षमता का विकास

कीट प्रतिरोधक क्षमता के विकास का सबसे सफल उदाहरण BT कपास है। आनुवांशिक रूप से संशोधित इस फसल का आविष्कार अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो द्वारा किया गया है। इसमें मिट्टी में पाए जाने वाले एक जीवाणु Bacillus Thuringiensis (BT) के Cry 1AC नामक जीन को कपास के जीनोम में प्रत्यारोपित किया गया है।

इस जीन के प्रभाव में कपास की कोशिकाएं एक विषैले प्रोटीन का निर्माण करती हैं, जो Ball Worm नामक कीट जो कि, कपास को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाता है, को मारकर कपास को सुरक्षा प्रदान करता है। इसी तर्ज पर BT के CPR2 जीन को प्रत्यारोपित कर BT बैगन का आविष्कार किया गया है, जो बैगन का Stem तथा Fruit Borer नामक कीट से बचाव करता है। 

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पोषण स्तर में सुधार

पोषण स्तर में सुधार की बात करें तो इसका एक अच्छा उदाहरण गोल्डन राइस है। इसका विकास Swiss Federal Institute of Technology तथा Peter Boyle द्वारा किया गया है। इसमें सामान्य चावल के जीनोम में डेफोडिल से प्राप्त बीटा केरोटिन जीन को प्रत्यारोपित किया गया है, जिससे चावल सुनहरा पीला हो जाता है एवं उसमें सामान्य चावल की तुलना में अधिक विटामिन ए प्राप्त होता है।

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बिल तथा मिलिंडा गेट फाउंडेशन के सहयोग से गोल्डन राइस की एक नई किस्म भी विकसित की गई है जिसमे विटामिन ए के साथ ही विटामिन ई, जिंक, आयरन तथा प्रोटीन की मात्रा भी बढ़ाई गयी है। जहाँ तक गोल्डन राइस के प्रयोग का विषय है अभी इन सभी किस्मों पर अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान मनीला में परीक्षण किया जा रहा है।

औषधीय गुणों का विकास

जीन अभियांत्रिकी से पादपों में औषधीय गुणों को बढ़ाया जा सकता है। इस तकनीक द्वारा अनेक खाद्य फसलों में किसी विशिष्ट एंटीजन को प्रत्यारोपित कर खाद्य वैक्सीन का विकास किया गया है, जिन्हें खाने से शरीर मे एंटीबॉडी का निर्माण होता है तथा रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित होती है। उदाहरणों की बात करें तो केले में Cholera का एंटीजन तथा आलू में Pertusis के एंटीजन का प्रत्यारोपण प्रमुख हैं।

भारत की स्थिति

भारत में आनुवांशिक रूप से संशोधित या GM फसलों के संदर्भ में परीक्षण, मूल्यांकन समेत अन्य सभी फैसले पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा गठित एक अस्थाई समिति Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) द्वारा लिए जाते हैं।

भारत में GM फसलों की शुरुआत की बात करें तो 1994 में BT-Cotton का खेतों में परीक्षण शुरू किया गया। इसके मूल्यांकन के बाद 2002 में GEAC ने इसे वाणिज्यिक कृषि के लिए उपयुक्त बताया एवं खेतों में इसके प्रयोग की अनुमति दी। वर्तमान में देश भर में उगाए जाने वाले कुल कपास का लगभग 94% BT कपास है। संशोधित कपास की खेती से रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग कम हुआ है तथा उत्पादकता में भी वृद्धि  हुई है।

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इसके अतिरिक्त 2007 में GEAC ने BT-बैगन की वाणिज्यिक खेती की बात कही, जिसका पूरे देश में विरोध हुआ, अंततः साल 2009 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा BT बैगन की खेती पर रोक लगा दी गयी। वहीं 2017 में भारत में ही संशोधित एक अन्य फसल GM-सरसों को भी कृषि के लिए उपयुक्त बताया गया हालांकि इसका भी कई कारणों के चलते विरोध किया जा रहा है। आनुवांशिक रूप से संशोधित खाद्य फसलों की खेती के विरोध में दिए जाने वाले कुछ मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं।

  1. इससे कृषि की लागत मूल्य में वृद्धि होगी।
  2. संशोधित फसलों में बनने वाले विषैले प्रोटीन एवं रसायन मानव स्वास्थ्य एवं मवेशियों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
  3. इससे आनुवंशिक प्रदूषण के खतरों की संभावना है जिसका जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

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