ब्लैक होल क्या है तथा कैसे बनता है? (Black Hole in Hindi)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे क्षेत्रों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। आज इस लेख में बात करेंगे खगोल विज्ञान के एक महत्वपूर्ण विषय ब्लैक होल (Black Hole in Hindi) के बारे में जानेंगे यह क्या होते हैं तथा किस प्रकार निर्मित होते हैं।

क्या है ब्लैक होल? (Black Hole in Hindi)

ब्लैक होल अंतरिक्ष में एक अत्यंत सघन (Dense) स्थान है, जिसके प्रभाव में आकार कोई भी वस्तु इससे बाहर नहीं निकल सकती। ब्लैक होल के Event Horizon के भीतर जो कुछ भी आता है वह ब्लैक होल के अकल्पनीय रूप से प्रबल गुरुत्वाकर्षण के कारण उसकी ओर आकर्षित हो जाता है। किसी ब्लैक होल का Event Horizon उसके चारों ओर की एक दहलीज है, जिससे आगे प्रत्येक वस्तु ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा आकर्षित कर ली जाती है।

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किसी ब्लैक होल में भौतिकी का कोई भी नियम लागू नहीं होता है। अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण होने के कारण यहाँ से प्रकाश भी लौट कर वापस नहीं आ पाता इसी कारण ब्लैक होल को एक काले गोले के रूप में दर्शाया जाता है। ब्लैक होल के बनने की बात करें तो ऐसा माना जाता है कि, ब्लैक होल का निर्माण ऐसे विशालकाय तारों द्वारा होता है, जो अपने जीवनकाल के आखिरी चरण में होते हैं। अतः ब्लैक होल के निर्माण को समझने से पहले हमारे लिए किसी तारे के सम्पूर्ण जीवन चक्र को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।

ब्लैक होल का इवेंट होराइज़न (Event Horizon)

इसे किसी वस्तु के पलायन वेग द्वारा समझा जा सकता है। पलायन वेग अर्थात वह गति जिसकी ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से बचने के लिए किसी वस्तु को आवश्यकता होती है। जैसे-जैसे कोई वस्तु ब्लैक होल (Black Hole in Hindi) के करीब जाती है उस पर लगने वाला गुरुत्वाकर्ष बल प्रबल होता जाता है तथा उसे अधिक पलायन वेग की आवश्यकता होती है।

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Event Horizon वह स्थान है, जहाँ किसी वस्तु को प्रबल गुरुत्वाकर्षण से निकलने के लिए प्रकाश की गति से भी अधिक गति की आवश्यकता होती है। चूँकि आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत (Special Theory of Relativity) के अनुसार, अंतरिक्ष में प्रकाश की गति से तेज कुछ भी नहीं चल सकता है। अतः इसका अर्थ है कि, ब्लैक होल का Event Horizon एक ऐसा बिंदु है, जहाँ से कुछ भी वापस नहीं आ सकता।

तारों का बनना

किसी आकाशगंगा में न केवल खरबों तारे मौजूद होते हैं, बल्कि अत्यधिक मात्रा में गैस और धूल भी होती है, जिसे नेब्यूला कहा जाता है। इस नेब्यूला में मौजूद गैसों में सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन और हीलियम के अणु होते हैं। आकाशगंगा में गैस और धूल के ये क्षेत्र तारों के बीच के स्थान में स्थित हैं।

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गैस और धूल के ये बादल धीरे-धीरे एक साथ आने लगते है तथा किसी डिस्क के आकार में गति करते हैं। धीरे-धीरे सारा द्रव्यमान डिस्क के केंद्र की ओर इकट्ठा होने लगता है तथा अपने ही गुरुत्वाकर्षण बल के कारण केंद्र में नाभिकीय संलयन जैसी घटना जन्म लेती है तथा किसी तारे का निर्माण होता है।

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तारों का जीवन

ब्रह्मांड में मौजूद किसी भी वस्तु का एक निश्चित जीवन काल होता। इसी प्रकार अंतरिक्ष में हमें दिखाई देने वाले ग्रहों, आकाशगंगाओं तथा तारों का भी एक निश्चित जीवन काल है। हमारी धरती पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य भी एक तारा है। ये तारे जीवन पर्यंत ऊर्जा उत्पन्न करते रहते हैं, जिस कारण ये हमें चमकते हुए दिखाई देते हैं। सूर्य से आने वाली ऊष्मा तथा रोशनी भी इसी ऊर्जा का हिस्सा है।

किसी भी कार्य को करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है तथा ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु ईंधन जरूरी होता है, इसी प्रकार तारों में ईंधन के रूप में हाइड्रोजन पाया जाता है, जो नाभिकीय संलयन की क्रिया द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करता है तथा वही ऊर्जा हमें भी प्रकाश एवं ऊष्मा के रूप में प्राप्त होती है।

नाभिकीय संलयन : तारों की ऊर्जा

नाभिकीय संलयन एक भौतिक घटना है, जिसमें दो हल्के नाभिक मिलकर एक भारी नाभिक का निर्माण करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। तारों में इसी क्रिया द्वारा ऊर्जा बनती है। यहाँ हाइड्रोजन बहुत उच्च तापमान पर गर्म होकर गैस से प्लाज्मा में परिवर्तित हो जाता है, इस कारण हाइड्रोजन परमाणु के भीतर मौजूद इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक के मध्य लगने वाला विद्युतचुंबकीय बल कमजोर होने लगता है और परमाणु में मौजूद इलेक्ट्रॉन नाभिक से अलग हो जाते हैं।

इसके अलावा अत्यधिक तापमान के कारण ये नाभिक तेज गति करते हुए एक दूसरे के बहुत नजदीक पहुँच जाते हैं, जिससे दो धनात्मक नाभिकों के मध्य लगने वाला प्रतिकर्षण बल भी मजबूत नाभिकीय बलों की तुलना में कमजोर पड़ जाता है और दो नाभिक आपस में संलयित हो जाते हैं।

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उदाहरण के तौर पर तारों में हाइड्रोजन के दो समस्थानिक ड्यूटीरियम (एक प्रोटोन तथा एक न्यूट्रॉन) एवं ट्राइटियम (एक प्रोटॉन तथा दो न्यूट्रॉन) मिलकर एक हीलियम के नाभिक (दो प्रोटॉन तथा दो न्यूट्रॉन) का निर्माण करते हैं इस अभिक्रिया में हीलियम नाभिक के साथ एक न्यूट्रॉन तथा अत्यधिक उर्ज़ा मुक्त होती है। 

चूँकि दो हाइड्रोजन नाभिकों का भार एक हीलियम नाभिक से अधिक होता है अतः संलयन के बाद बचा हुआ द्रव्यमान आइंस्टीन के सूत्र E=mc2 के अनुसार उर्ज़ा में बदल जाता है। सूर्य से हमें मिलने वाला प्रकाश तथा ऊष्मा इसी उर्ज़ा के उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया में एक भारी नाभिक टूट कर दो छोटे नाभिक वाले तत्वों में बदल जाता है। नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों में इसी तकनीक द्वारा विद्युत बनाई जाती है।

तारों की मृत्यु

चूँकि तारों का अस्तित्व उनमें मौजूद ईंधन के चलते ही है, जो समय के साथ धीरे-धीरे कम होता जाता है। एक शोध से पता चला है कि, सूर्य का लगभग आधा ईंधन समाप्त हो चुका है अतः अब सूर्य केवल 5 अरब साल तक ही अस्तित्व में बना रहेगा तथा पृथ्वी को रोशनी दे सकेगा। आइए अब जानते हैं किसी तारे की मृत्यु किस प्रकार होती है? किसी तारे में मुख्यतः दो बल कार्य करते हैं एक गुरुत्वाकर्षण जो तारे के केंद्र की तरफ लगता है तथा दूसरा नाभिकीय संलयन की स्थिति में निकलने वाली अथाह ऊर्जा के कारण बाहर की ओर आरोपित बल।

इन्हीं दो बलों के कारण तारा संतुलित अवस्था में रह पाता है। जब तारे में ईंधन खत्म होने लगता है तो नाभिकीय ऊर्जा द्वारा बाहर को आरोपित बल भी पहले की तुलना में कम हो जाता है, जबकि गुरुत्वाकर्षण बल पूर्व जितना ही है, ऐसी स्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल अधिक शक्तिशाली होने लगता है तथा यह तारे को भीतर की ओर सिकोड़ना शुरू कर देता है। किसी भी तारे की मृत्यु  एवं उसके बाद उसकी स्थिति तारे के द्रव्यमान पर निर्भर करती है। हमनें इन तारों को तीन श्रेणियों (कम द्रव्यमान, मध्यम द्रव्यमान तथा अधिक द्रव्यमान) में विभाजित कर इनकी मृत्यु को समझाया है।

परमाणु संलयन न केवल तारों को ढहने से रोकता है, बल्कि इसके द्वारा ही उन तत्वों का भी निर्माण हुआ, जो पहले कभी अस्तित्व में नहीं थे। अपने आकार के आधार पर तारे आयरन (Fe) तक संलयन के माध्यम से तत्व बना सकते हैं, जिसकी परमाणु संख्या 26 है। गौरतलब है कि आवर्त सारणी में 118 तत्व हैं, अतः अन्य तत्व किसी तारे की मृत्यु के समय बनते हैं, जिसके बारे में हम आगे जानेंगे।

हल्के तारों की मृत्यु

सबसे छोटे तारे ग्रह माने जाने के लिए बहुत बड़े हैं, जबकि तारे माने जाने के लिए बहुत छोटे, वे अपने कम द्रव्यमान के कारण हाइड्रोजन के संलयन को बनाए रखने में असमर्थ हैं और उन्हें “विफल तारे” के रूप में जाना जाता है। छोटे धीमी गति से जलने वाले लाल बौने तारों का जीवन बहुत लंबा लगभग एक से दस ट्रिलियन वर्षों के बीच रहता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि, जब छोटे तारे समाप्त हो जाते है तो वे सफेद बौने तारे (White Dwarf) में परिवर्तित हो जाते हैं। ये बहुत घने तारे हैं, जो ईंधन नहीं जलाते हैं। इसके पश्चात ये तारे ठंडे होकर काले बौने तारों में परिवर्तित हो जाते हैं। 

मध्यम तारों की मृत्यु

जब मध्यम आकार के तारे, जैसे सूर्य में ईंधन के रूप में मौजूद हाइड्रोजन समाप्त हो जाता है तो उनका कोर सिकुड़ने तथा गर्म होने लगता है, जिससे गैस की बाहरी परतों का विस्तार होता है और तारे लाल विशालकाय तारे (Red Giant Star) बन जाते हैं। आखिरकार जब एक लाल विशालकाय तारे का कोर ठंडा हो जाता है, तो शेष गैस अंतरिक्ष में फैल जाती है, जिससे Planetary Nebula का निर्माण होता है। इसका केंद्र भी एक सफेद बौना तारा या White Dwarf होता है।

विशालकाय तारों की मृत्यु 

विशालकाय तारे (सूर्य के 1.4 गुना या अधिक बड़े) छोटे तारों की तुलना में बहुत कम समय में मर जाते हैं इसका मुख्य कारण उनका अत्यधिक द्रव्यमान है, जिसके कारण उनका गुरुत्वाकर्षण बल बहुत अधिक होता है तथा इसी बल को संतुलित करने के लिए तारों के कोर में बहुत तेजी से नाभिकीय संलयन की क्रिया होती है तथा ऐसे तारे बहुत कम समय में अपना समस्त ईंधन खो देते हैं।

छोटे तारों के विपरीत जब इन तारों में हाइड्रोजन खत्म हो जाता है तो अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण हीलियम नाभिक संलयित होकर बड़े तत्वों का निर्माण करते हैं यह प्रक्रिया चलती रहती है जब तक कि कोर में अंतिम तत्व के रूप में आयरन का निर्माण न हो जाए।

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लोहे के बाद इनमें आगे और संलयन नहीं हो पाता इस स्थिति में तारा अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़न शुरू होता है तथा इससे कोर मे मौजूद आयरन अत्यधिक गर्म हो जाता है। गुरुत्वाकर्षण बल इतना प्रबल होता है की तारे के कोर में मौजूद आयरन के इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन मिलकर न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं। एक सेकंड से भी कम समय में, लोहे का कोर जो हमारी पृथ्वी के आकार का है, लगभग 6 मील (10 किलोमीटर) की त्रिज्या के एक न्यूट्रॉन कोर में बदल जाता है।

तारे के सिकुड़ने से कोर अरबों डिग्री तक गर्म होता है और इसके परिणामस्वरूप ब्रह्मांड में एक भयानक विस्फोट विस्फोट होता है, जिसे हम सूपरनोवा के नाम से जानते हैं। इसके बाद बचा हुआ कोर एक न्यूट्रॉन तारे का निर्माण करता है और यदि इसका आकार बहुत अधिक हो तो यह किसी ब्लैक होल (What is Black Hole in Hindi) में परिवर्तित हो जाता है।

चंद्रशेखर लिमिट (Chandrashekhar Limit in Hindi)

1930 में भारतीय भौतिक वैज्ञानिक (Astrophysicist) सुब्रमण्यम चंद्रशेखर ने यह बताया कि, यदि किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 1.4 गुना या उससे अधिक है तो ऐसे तारे सूपरनोवा जैसी घटना द्वारा नष्ट होंगे तथा अपने द्रव्यमान के आधार पर न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल में परिवर्तित हो जाएंगे। इस लिमिट को उनके नाम पर चंद्रशेखर लिमिट नाम दिया गया तथा इसके लिए उन्हें साल 1983 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 

Neutron Capture Process: बड़े तत्वों का निर्माण

सुपरनोवा के प्रारंभिक विस्फोट में इतनी ऊर्जा होती है कि, यह परमाणुओं को कोर में विभाजित कर सकती है। विस्फोट के बाद के क्षणों में आयरन कोर से न्यूट्रॉन कणों का प्रवाह होने लगता है। अत्यधिक वेग युक्त ये न्यूट्रॉन हल्के नाभिकों से टकराकर भारी नाभिकों का निर्माण करते हैं। सुपरनोवा के विस्फोट के दौरान होने वाला न्यूक्लियोसिंथेसिस ही लोहे से अधिक परमाणु संख्या वाले तत्वों का निर्माण करता है, जिन्हें परमाणु संलयन द्वारा नहीं बनाया जा सकता। ब्रह्मांड की शुरुआत में तारों के इस तरह नष्ट होने से ही सोने समेत कई नए तत्वों का निर्माण हुआ।

Black Hole In Hindi
Credit: AUSTRALIA TELESCOPE NATIONAL FACILITY

ब्लैक होल की पहली तस्वीर

इवेंट होराइजन टेलीस्कोप का प्रयोग करते हुए साल 2019 में पहली बार किसी ब्लैक होल को देखा गया तथा उसका चित्र प्राप्त किया गया। बता दें कि इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (EHT) रेडियो टेलीस्कोप का एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क है। ब्लैक होल की यह छवि M87 गैलेक्सी जो पृथ्वी से लगभग 55 मिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित एक अण्डाकार गैलेक्सी है, के केंद्र से प्राप्त की गई। 

यह ब्लैक होल सूर्य के द्रव्यमान का 6.5 अरब गुना है। इसके चित्र को लेने के लिए दुनियाँ भर के आठ ग्राउंड-आधारित रेडियो टेलीस्कोपों का इस्तेमाल किया गया था। इन आठ विभिन्न टेलिस्कोपों को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया था जिससे ये किसी अकेले टेलिस्कोप की भाँति कार्य कर सकें।

Black Hole In Hindi
ब्लैक होल की पहली तस्वीर / सौजन्य: नासा

ब्लैक होल की खोज के लिए नोबेल

ब्लैक होल की खोज के लिए साल 2020 में तीन भौतिक वैज्ञानिकों Sir Roger PenroseReinhard Genzel तथा Andrea Ghez को नोबेल पुरस्कार दिया गया। हालाँकि ब्लैक होल की कल्पना आइंस्टीन ने की, किन्तु रोजर पेनरोज़ ने सापेक्षता के सिद्धांत की इस कल्पना को गणितीय निरूपण द्वारा सत्यापित किया।

जनवरी 1965 में आइंस्टीन की मृत्यु के दस साल बाद, रोजर पेनरोज़ ने साबित किया कि, ब्लैक होल (Black Hole in Hindi) वास्तव में बन सकते हैं और उनका विस्तार से वर्णन किया। इसके अतिरिक्त अन्य दो वैज्ञानिकों को हमारी गैलेक्सी के मध्य में एक बहुत भारी वस्तु के खोज के लिए यह पुरस्कार दिया गया। गौरतलब है कि, इस भारी वस्तु को केवल ब्लैक होल द्वारा ही स्पष्ट किया जा सकता है।

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इस लेख में हमनें ब्लैक होल से संबंधित सभी पहलुओं पर बताने का प्रयास किया है। उम्मीद है, आपको ये लेख (Black Hole in Hindi) पसंद आया होगा, टिप्पणी कर अपने सुझाव अवश्य दें। अगर आप भविष्य में ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में पढ़ते रहना चाहते हैं तो हमें सोशियल मीडिया में फॉलो करें तथा हमारा न्यूज़लैटर सब्सक्राइब करें एवं इस लेख को सोशियल मीडिया मंचों पर अपने मित्रों, सम्बन्धियों के साथ साझा करना न भूलें।

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