सरोगेसी एवं भारत में सरोगेसी को लेकर नियम एवं कानून (Surrogacy in Hindi)

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क्या है सरोगेसी? (Surrogacy in Hindi)

‘सरोगेट’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द सरोगेटस (Surrogatus) से हुई है, जिसका अर्थ एक महिला का दूसरी महिला के विकल्प के रूप में कार्य करने से है। सरोगेसी (Meaning of Surrogacy in Hindi) एक चिकित्सकीय सेवा है, जिसमें कोई शादीशुदा दंपति किसी स्वस्थ महिला से एक समझौता करते हैं। इस समझौते के तहत कोई दंपति अपनी संतान प्राप्ति के लिए अन्य स्वस्थ महिला की कोख या गर्भ को किराए पर लेते हैं। ऐसी महिला जो यह सेवा उपलब्ध करवाती है उसे सरोगेट मदर (Surrogate Mother) कहा जाता है। इसे सामान्यतः किराए की कोख भी कहा जाता है।

क्यों है सरोगेसी को आवश्यकता?

Surrogacy द्वारा संतान प्राप्ति की मुख्य वजहों में मुख्य रूप से किसी दंपति का बच्चा पैदा करने में समर्थ न होना शामिल है, जिसके कई कारण हो सकते हैं। वर्तमान में भागती-दौड़ती जिंदगी, गलत लाइफ स्टाइल तथा खान-पान की वजहों से इन्फर्टिलिटी अथवा बांझपन जैसी दिक्कत भी तेजी से बढ़ रही है, जिस कारण शादीशुदा दंपति सरोगेसी को एक अच्छा विकल्प मान रहे हैं।

इसके अतिरिक्त किसी महिला के शरीर में यूट्रस यानी गर्भाशय का पूर्ण रूप से विकसित न होना, शारीरिक बनावट से संबंधित किसी समस्या का होना, अधिक उम्र जैसे कारण सरोगेसी को बढ़ावा दे रहे हैं। कई परिस्थितियों में यह भी देखा गया है कि, महिलाएं शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद संतान की प्राप्ति के लिए अपने गर्भाशय का प्रयोग करने से बचती है।

सरोगेसी के प्रकार

सरोगेसी सेवा मुख्यतः दो प्रकार से उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें ट्रेडिशनल सरोगेसी (Traditional Surrogacy) तथा जेस्टेशनल सरोगेसी (Gestational surrogacy) शामिल हैं। ट्रेडिशनल सरोगेसी में पिता के शुक्राणु को दूसरी स्वस्थ महिला के अंडाणु से निषेचित किया जाता है इस विधि में संतान के पास अनुवांशिक पदार्थ केवल पिता का ही होता है। जबकि दूसरी विधि में माता-पिता से प्राप्त अंडाणु तथा शुक्राणु को परखनली द्वारा निषेचित कर स्वस्थ महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इसमें प्राप्त संतान में माता तथा पिता दोनों के अनुवांशिक गुण मौजूद होते हैं।

भारत की स्थिति

भारत में सरोगेसी की शुरुआत साल 2002 से हुई। इसे भारत में चिकित्सा पर्यटन (Medical Tourism) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वैध किया गया था। इस निर्णय के बाद भारत धीरे-धीरे व्यवसायिक सरोगेसी का केंद्र बन गया। व्यवसायिक सरोगेसी सेवा किसी उपयुक्त महिला को उचित सेवा शुल्क देकर प्राप्त की जाती है। CII द्वारा साल 2012 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के सरोगेसी उद्योग का आकार 2 अरब डॉलर प्रति वर्ष था, और यह अनुमान लगाया गया था कि देश भर में 3,000 से अधिक फर्टिलिटी क्लीनिक इसमें शामिल थे।

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इसके खर्च की बात करें तो भारत में सरोगेसी की अनुमानित लागत लगभग $ 20,000 से  $30,000 के बीच होती है। हालाँकि सरोगेसी की सेवा देने वाली महिलाओं को तकरीबन 4 से 5 लाख रुपये तक ही दिए जाते हैं इसके अतिरिक्त गर्भावस्था के दौरान महिला को कई अन्य सुविधाएं संतान चाहने वाले दंपति द्वारा उपलब्ध कारवाई जाती है। भारत में सरोगेसी के इतना लोकप्रिय होने के कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं।

  • सरोगेसी से संबंधित कोई मजबूत कानून का न होना। 
  • बेरोजगारी तथा गरीबी के चलते सरोगेसी की सेवा देने वाली महिलाओं का आसानी से उपलब्ध होना।
  • अन्य देशों की तुलना में भारत में यह सेवा बहुत सस्ती है जिस कारण विदेशी लोग भारत को इसके लिए प्राथमिकता देते थे। उदाहरण के तौर पर अमेरिका में इसकी लागत लगभग $100,000 है। 

सरोगेसी से संबंधित समस्याएं

सरोगेसी के अनियमित व्यवसाय ने अनैतिक प्रथाओं जैसी समस्याओं को भी जन्म दिया। व्यवसायिक सरोगेसी के कारण बिचौलियों और वाणिज्यिक एजेंसियों को सबसे अधिक लाभ हुआ। इससे उत्पन्न कुछ अन्य समस्याएं निम्नलिखित हैं।

  • सरोगेट माताओं का शोषण अथवा उनकी गरिमा का हनन।
  • सरोगेसी से पैदा हुए बच्चों का परित्याग,अंग व्यापार तथा भ्रूण आयात
  • कई स्थितियों में सरोगेट माताएं भावनाओं के चलते बच्चे को दंपति को देने से इंकार कर देती है जिसके चलते दंपति तथा सरोगेट माताओं के बीच कानूनी विवाद की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  • बच्चे के विकलांग या किसी शारीरिक समस्या के साथ पैदा होने के चलते विवाद।
  • सरोगेसी से प्राप्त बच्चों की नागरिकता संबंधित विवाद। 
  • ऐसी सेवा देने वाले अस्पतालों पर कमजोर नियंत्रण। 
  • इसका चिकित्सकीय सेवा के बजाए चिकित्सकीय सुविधा के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा जिसका प्रयोग अविवाहित लोग तथा स्वस्थ दंपति भी कर रहे थे। 

सरोगेसी के लिए कानूनी मसौदा

इन सब समस्याओं के चलते 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवसायिक सरोगेसी पर रोक लगा दी तथा इसी के साथ इस विषय पर एक ठोस कानून बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हुई। एक साल बाद 2016 में केंद्र सरकार द्वारा पहली बार सरोगसी (Surrogacy in Hindi) से संबंधित कानून सरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2016 संसद में पेश किया जो संसद के भंग होने के बाद समाप्त हो गया।

इसके पश्चात सरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2019 को 15 जुलाई, 2019 को लोकसभा में पेश किया गया जिसे 5 अगस्त, 2019 को लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया। सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल 2019 पूर्व के बिल की ही प्रतिकृति है जो तब दोनों सदनों में पारित नहीं हो पाया।

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लोक सभा से पारित होने के बाद राज्यसभा में विधेयक 21 नवंबर 2019 को जाँच और परामर्श के लिए एक 23 सदस्यों वाली प्रवर समिति के पास भेजा गया। समिति ने 5 फरवरी 2020 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, समिति ने जाँच के बाद कुल 15 सिफारिशें पेश की। संशोधित विधेयक यानी सरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2020 पुराने मसौदे का एक सुधारित संस्करण है जिसे कैबिनेट द्वारा चयन समिति की सिफारिशों को मान लेने के बाद फरवरी 2020 में मंजूरी दे दी गई है। वर्तमान में विधेयक लंबित है।

सरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2020

नियमन

यह बिल व्यवसायिक सरोगेसी को प्रतिबंधित करता है लेकिन निस्वार्थ सरोगेसी की अनुमति देता है। निस्वार्थ सरोगेसी में सरोगेट माता को गर्भावस्था के दौरान दिए जाने वाले मेडिकल खर्चे और बीमा कवरेज के अतिरिक्त कोई मौद्रिक मुआवजा शामिल नहीं होता जबकि व्यवसायिक सरोगेसी में बुनियादी मेडिकल खर्चे और बीमा कवरेज की सीमा से अधिक मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या किसी वस्तु के रूप में) लेना शामिल है।

सरोगेसी के लिए योग्यता

निम्नलिखित लोगों को सरोगेसी की अनुमति है।

  • ऐसे दंपत्ति जो किसी प्रामाणित इनफर्टिलिटी से पीड़ित हों
  • निस्वार्थ सरोगेसी जो व्यावसायिक उद्देश्य के लिए न हो
  • जिसमें बिक्री, वेश्यावृत्ति या शोषण के अन्य प्रकारों के लिए बच्चे को जन्म न दिया जाए
  • कानून द्वारा विनिर्दिष्ट कोई स्थिति या बीमारी।

इच्छुक दंपत्ति के पास समुचित अथॉरिटी द्वारा जारी ‘अनिवार्यता का प्रमाणपत्र’ और ‘योग्यता का प्रमाणपत्र’ होना चाहिए।

अनिवार्यता का प्रमाण पत्र निम्नलिखित स्थितियां होने पर जारी किया जाएगा। 

  • यदि इच्छुक दंपत्ति में एक या दोनों सदस्यों की प्रामाणित इनफर्टिलिटी का सर्टिफिकेट जिला मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी किया गया हो। 
  • मजिस्ट्रेट की अदालत ने सरोगेट बच्चे के पेरेंटेज और कस्टडी से संबंधित आदेश जारी किया हो 
  • 16 महीने की अवधि के लिए बीमा कवरेज सरोगेट माता की प्रसव उपरांत की जटिलताओं को कवर करता हो।

योग्यता का प्रमाणपत्र इच्छुक दंपत्ति द्वारा निम्नलिखित शर्तें पूरी करने पर ही जारी किया जाएगा। 

  • यदि ऐसे दंपति भारतीय नागरिक हों और उन्हें विवाह किए हुए कम से कम पांच वर्ष हो गए हों। 
  • उनमें से एक 23 से 50 वर्ष के बीच की महिला (पत्नी) और दूसरा 26 से 55 वर्ष का पुरुष (पति) हो। 
  • उनका कोई जीवित बच्चा (बायोलॉजिकल, गोद लिया हुआ या सरोगेट) न हो, इसमें ऐसे बच्चे शामिल नहीं हैं, जो मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग हैं या जीवन को जोखिम में डालने वाली या प्राणघातक बीमारी से ग्रस्त हैं। 
  • कोई ऐसी स्थिति जिसे रेगुलेशनों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। 

सरोगेट माताओं के लिए योग्यता

समुचित अथॉरिटी से योग्यता का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए सरोगेट माता को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना चाहिए

  • महिला को इच्छुक दंपत्ति का निकट संबंधी होना चाहिए
  • उसे विवाहित होना चाहिए और उसका अपना बच्चा होना चाहिए
  • उसे 25 से 35 वर्ष के बीच होना चाहिए
  • उसने पहले सरोगेसी न की हो
  • उसके पास सरोगेसी करने के लिए मेडिकल और मनोवैज्ञानिक फिटनेस का सर्टिफिकेट हो। इसके अतिरिक्त सरोगेट माता सरोगेसी के लिए अपने गैमेट्स नहीं दे सकती।

इसके अतिरिक्त विधेयक के कानून बनने के 90 दिनों के भीतर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा एक या एक से अधिक समुचित अधिकारियों को नियुक्त किया जाएगा। ये अधिकारी सरोगेट क्लिनिकों का पंजीकरण करना अथवा उन्हें सस्पेंड या रद्द करना, सरोगेसी क्लिनिकों के लिए मानदंडों को लागू करना तथा बिल के प्रावधानों का उल्लंघन होने पर जांच और कार्रवाई करने जैसे कार्यों के लिए उत्तरदायी होंगे।

अपराध एवं दंड 

विधेयक में अपराध एवं दंड के बारे में भी बताया गया है जिसके अनुसार कमर्शियल सरोगेसी करना या उसका विज्ञापन करना, सरोगेट माता का शोषण करना, सरोगेट बच्चे का परित्याग, शोषण या उसे अपनाने से इनकार करना, सरोगेसी के लिए मानव एंब्रयो या गैमेट्स को बेचना या आयात करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं। इन अपराधों पर न्यूनतम 10 वर्ष तक की कैद और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

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