क्रायोजेनिक इंजन क्या है? (Cryogenic Engine in Hindi)

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क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic Engine)

क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण में भारत की यात्रा से पहले समझते हैं क्रायोजेनिक इंजन होता क्या है? क्रायो का शाब्दिक अर्थ निम्न ताप होता है, क्रायोजेनिक इंजन किसी सामान्य इंजन की तरह ही है अंतर केवल इतना है कि, इसमें ईंधन के रूप में द्रव हाइड्रोजन तथा द्रव ऑक्सीजन का प्रयोग किया जाता है। ये दोनों अत्यधिक निम्न ताप क्रमशः -183 तथा -256 डिग्री सेंटीग्रेड पर द्रवित होते हैं अतः इन दोनों गैसों को द्रव अवस्था मे परिवर्तित करना एवं पूरी प्रक्रिया के दौरान उक्त अतिनिम्न ताप बनाए रखना ही क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic Engine) के निर्माण में मुख्य चुनौती होती है।

क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic Engine) में हाइड्रोजन मुख्य ईंधन तथा ऑक्सीजन ऑक्सीकारक अर्थात ईंधन को जलाने का कार्य करता है। इस इंजन का उपयोग भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने में किया जाता है क्रायोजेनिक इंजन अन्य की तुलना में अत्यधिक दक्ष होता है। द्रव हाइड्रोजन के दहन से निकलने वाली ऊर्जा से क्रायोजेनिक इंजन युक्त यान लगभग 4.4 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से गति कर सकता है। चूँकि हाइड्रोजन सबसे हल्का तत्व है अतः इसको ईंधन के रूप में प्रयोग करने से यान का भार भी कम रहता है।

क्रायोजेनिक इंजन की आवश्यकता

किसी भी देश की प्रगति के लिए फिर चाहे वह संचार का क्षेत्र हो, सुरक्षा का मुद्दा हो या अन्य किसी प्रकार की प्रौद्योगिकी हो उसमें अंतरिक्ष विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान होता है। प्रौद्योगिकी की मदद से मानव निर्मित उपग्रहों द्वारा कई क्षेत्रों में क्रांति हो रही है, किन्तु ऐसे उपग्रहों को बनाना एक चुनौती थी एवं उससे भी बड़ी चुनौती थी ऐसे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजना।

अधिकतर महत्वपूर्ण उपग्रहों का भार लगभग दो टन से अधिक होता है अतः ऐसे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भू-तुल्यकाली कक्षाओं (सतह से 36,000 Km) में स्थापित करने के लिए एक विशेष प्रकार के यान की आवश्यकता महसूस हुई, जिसका इंजन इतने भारी उपग्रहों को इतनी अधिक ऊँचाई तक ले जाने में सक्षम हो। इसी के साथ शुरुआत हुई क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic Engine in Hindi) के निर्माण की। 

क्रायोजेनिक इंजन का इतिहास तथा भारत की यात्रा

सर्वप्रथम क्रायोजेनिक इंजन का निर्माण अमेरिका ने किया तत्पश्चात रूस, फ्रांस ,जापान तथा चीन भी क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण करने में सफल रहे। भारत ने भी, जब देश में संचार व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता हुई तब सन 1987 से इस पर कार्य करना शुरू किया और 12 करोड़ की धनराशि से इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई।

रूस से समझौता

चूँकि स्वदेशी तकनीक पर आधारित क्रायोजेनिक इंजन बनाने में अधिक समय लगता अतः भारत ने अन्य देशों से इस तकनीक को लेने पर भी विचार किया, किन्तु फ्रांस तथा अमेरिका द्वारा भारत को क्रायोजेनिक इंजन देने से मना कर दिया गया इसके बाद भारत ने सन 1991 में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) की अंतरिक्ष एजेंसी Glavkosmos के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत रूस ने भारत को दो क्रायोजेनिक इंजन तथा उसकी प्रौद्योगिकी देने का वादा किया।

अन्य देश नहीं चाहते थे कि, भारत क्रायोजेनिक इंजन युक्त देश बने अतः सभी देशों ने भारत द्वारा क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण का विरोध यह कह कर किया गया कि, यह पूर्णतः MTCR (Missile Technology Control Regime) का उल्लंघन है। हाँलाकि यह बात अमेरिका तथा यूरोपीय देश जानते थे कि, भारत इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग संचार तकनीक को सदृढ़ बनाने के लिए करना चाहता है।

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गौरतलब है कि MTCR एक संधि है, जो युद्ध मे प्रयुक्त होने वाली मिसाइलों तथा उनकी प्रौद्योगिकी के व्यापार पर प्रतिबंध लगाती है। MTCR संधि के उल्लंघन का बहाना बनाते हुए अमेरिका ने Glavkosmos तथा ISRO दोनों पर प्रतिबंध लगा दिए। परिणामस्वरूप एक साल बाद रूस ने क्रायोजेनिक इंजन की प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से साफ इंकार कर दिया, हाँलाकि भारत के विरोध करने पर रूस ने 2 के बजाए 7 क्रायोजेनिक इंजन भारत को दिए।

स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का परीक्षण

स्वदेशी तकनीक पर आधारित क्रायोजेनिक इंजन बनाने की शुरुआत 1994 से हुई तथा फरवरी 2000 में भारत ने स्वदेशी तकनीक का प्रयोग कर बने क्रायोजेनिक इंजन का पहला परीक्षण किया, किन्तु यह असफल रहा। 2003 आते-आते भारत ने इंजन बना लिया अब बारी थी इसे यान या रॉकेट से जोड़ने की, जिसमें पुनः चार साल लगे और 2007 में इसे GSLV से जोड़ दिया गया। 2007 में इंजन को रॉकेट से जोड़ने के बाद पहला परीक्षण अप्रैल 2010 में किया गया, जो असफल रहा।

अंततः साल 2014 के जनवरी महीने में भारत ने क्रायोजेनिक इंजन युक्त प्रक्षेपण यान GSLV-D5 द्वारा GSAT-14 जो एक संचार उपग्रह था, को प्रक्षेपित किया। यह परीक्षण सफल रहा और इसी के साथ भारत क्रायोजेनिक इंजन युक्त देशों में शामिल हो गया। वर्तमान की बात की जाए तो केवल छः ही देशों के पास यह तकनीकी है, जिनमें अमेरिका, रूस, फ्रांस ,जापान, चीन तथा भारत शामिल हैं।

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