कैसे हुआ आज़ादी के बाद भारत का एकीकरण? (Unification of India in Hindi)

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भारत की आज़ादी

देश की ग़ुलामी के अंतिम समय में जब हिंदुस्तान आज़ाद होने जा रहा था मुस्लिम लीग नें अलग देश पाकिस्तान की माँग की तत्पश्चात अगस्त 1947 में हिंदुस्तान भारत एवं पाकिस्तान दो राष्ट्रों में विभाजित हो गया। किन्तु जो भारत आज़ाद हुआ वह आज के भारत जैसा एक राष्ट्र नहीं था यह ब्रिटिश हुकूमत वाले कुछ क्षेत्रों तथा सैकड़ों छोटे छोटे राजाओं की अलग अलग रियासतों से बना भारत था। आजादी के समय भारत में ब्रिटिश हुकूमत के क्षेत्रों के अलावा 565 देशी रियासतें थी जिनको भारत संघ में मिला कर एक भारत का निर्माण किया गया। इस कार्य को करने में तत्कालीन रियासतों के मंत्री सरदार पटेल नें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Lapse of Paramountcy

आज़ादी मिलने के बाद ब्रिटिश शासन वाले क्षेत्र भारत सरकार के शासन में आ गए तथा अन्य देशी रियासतों के सामने 15 अगस्त से पूर्व भारत या पाकिस्तान में विलय होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प रखा तथा इसी को Lapse of Paramountcy कहा गया। अधिकतर देशी रियासतें भारत संघ में अपना विलय करने को राज़ी हो गयी किन्तु कुछ देशी रियासतों नें पाकिस्तान से मिलनें तथा कुछ नें स्वतंत्र रहने अर्थात भारत एवं पाकिस्तान किसी में विलय न करने की इच्छा जताई।

विवादित प्रांत

इन विवादित रियासतों में दक्षिण का त्रावणकोर (वर्तमान केरल तथा कर्नाटक का कुछ भाग), भोपाल, हैदराबाद तथा कश्मीर प्रमुख थे यहाँ के शासक अपनी रियासत को स्वतंत्र रखना चाहते थे। इसके अतिरिक्त गुजरात के जूनागढ़ तथा जोधपुर के शासक जिन्ना के बहकाने पर अपनी रियासतों को पाकिस्तान में मिलाने के लिए राजी हो गए।

त्रावणकोर, भोपाल तथा जोधपुर

त्रावणकोर के स्वतंत्र राज्य रहने के फैसले के कारण वहाँ की जनता ने इसका कड़ा विरोध किया तथा वहाँ के राजा पर जानलेवा हमला हुआ, अंततः त्रावणकोर 30 जुलाई 1947 को भारत के साथ विलय के लिए सहमत हो गया।

इसी प्रकार प्रारंभ में भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खाँ ने भी स्वतंत्र राज्य बनाने अथवा पाकिस्तान में विलय कर लेने की बात कही किन्तु जुलाई 1947 में भोपाल भी भारत मे विलय को राजी हो गया। इसके अतिरिक्त जिन्ना ने जोधपुर के महाराजा हनुवंत सिंह को भी पाकिस्तान में विलय के लिए प्रलोभन दिए किन्तु 11 अगस्त 1947 को जोधपुर भारत मे शामिल हो गया।

इस प्रकार त्रावणकोर, भोपाल तथा जोधपुर आज़ादी से पूर्व भारत मे शामिल हो गए। किन्तु आज़ादी के बाद भी तीन रियासतें जूनागढ़, कश्मीर तथा हैदराबाद भारत से अलग थी। कश्मीर को हमने एक अलग लेख में विस्तार से समझाया है, पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। जूनागढ़ तथा हैदराबाद के बारे में हम इस लेख में चर्चा करेंगे।

जूनागढ़

मुहम्मद अली जिन्ना के दबाव के कारण जूनागढ़ पाकिस्तान में विलय करने के लिए मंज़ूर हो गया, किन्तु जूनागढ़ की दो छोटी जांगीरों मंगरोल तथा बाबरियावाड़के शासकों ने भारत में विलय पर सहमति जताई, फलस्वरूप जूनागढ़ के नवाब नें इन दोनों जंगीरों में अपनी सेना भेज दी। जवाब में भारत सरकार नें भी 24 सितंबर को जूनागढ़ की घेराबंदी शुरू कर दी।

इसके अतिरिक्त जूनागढ़ का शासक मुस्लिम एवं प्रजा हिन्दू थी अतः जनता ने राजा के पाकिस्तान में विलय के फैसले का विरोध किया। जनता के विरोध तथा भारतीय सेना की घेराबंदी को देखते हुए नवाब भाग कर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ़ का शासन वहाँ के दीवान के हाथों में आ गया। जूनागढ़ के दीवान नें पाकिस्तान से सहायता माँगनी चाही किन्तु जिन्ना का इस पर कोई जवाब नहीं आया। अंततः जूनागढ़ के दीवान नें नवंबर 1947 में भारत में विलय होने (Unification of India in Hindi) का निर्णय लिया।

हैदराबाद

हैदराबाद भारत के दक्कन में स्थित 82,698 वर्ग मील में फैला प्रान्त था। जिसमें आज के आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तथा छत्तीसगढ़ के कुछ जिले शामिल थे। हैदराबाद के पास अपनी सेना, रेल सेवा तथा डाक विभाग भी था। आबादी तथा अर्थव्यवस्था के हिसाब से भी हैदराबाद भारत के सबसे बड़े राज्यों में शामिल था। हैदराबाद की आबादी में तकरीबन 80 फीसदी हिन्दू थे और इसके बावजूद सेना एवं प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर अल्पसंख्यक मुस्लिमों का अधिपत्य था। यहाँ का नवाब मीर उस्मान अली विश्व के सबसे अमीर लोगों में शामिल था।

हैदराबाद रियासत

अंग्रेजों से आज़ादी के बाद नवाब भारत में विलय के बिल्कुल पक्ष में नहीं था। उसके भारत विरोधी होने का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने जिन्ना को भेजे एक संदेश में जिन्ना से पूछा था कि हैदराबाद के भारत से युद्ध होने की स्थिति क्या पाकिस्तान हैदराबाद के साथ देगा?

Stand Still Agreement

हैदराबाद के अपनी स्वतंत्रता की बात पर अड़े रहने के चलते हैदराबाद तथा भारत सरकार के मध्य नवम्बर 1947 में एक Stand Still Agreement पर दस्तखत हुए, जिसका मतलब था कि एक वर्ष की अवधि तक हैदराबाद तथा भारत के संबंध पूर्व की तरह ही चलते रहेंगे तथा एक साल बाद नवाब को अपना निर्णय लेना होगा। दूसरे शब्दों में हैदराबाद को विलय के बारे मे सोचने के लिए एक साल का समय मिल गया था। धीरे धीरे समय बीतता गया तथा हैदराबाद ने Stand Still Agreement की शर्तों का उल्लंघन करते हुए पाकिस्तान से बातचीत करना तथा हथियारों का आयात शुरू कर दिया इतना ही नहीं हैदराबाद ने पाकिस्तान को तकरीबन 20 करोड़ रुपयों का लोन भी दे डाला।

नवाब का खास कासिम रिज़वी जो MIM का नेता तथा एक मुस्लिम कट्टरपंथी था और हैदराबाद की स्वतंत्रता या उसके पाकिस्तान में विलय का कट्टर समर्थक था, ने रजाकार नाम से हथियार बंद लोगों का एक संगठन तैयार कर लिया। रज़ाकारों ने Stand Still Agreement का फायदा उठाते हुए राज्य में लूटपाट, हत्याएं तथा बलात्कार जैसे संगीन अपराध करने शुरू कर दिए। इनके निशाने पर मुख्यतः वे सभी लोग थे जो भारत के पक्ष में बात करते थे, और इनमें अधिकतर हिन्दू थे।

ऑपरेशन पोलो

अंततः जब कोई विकल्प नहीं बचा तो सरदार पटेल के कहने पर भारतीय सेना ने 13 सितम्बर 1948 को हैदराबाद में सैन्य कार्यवाही शुरू कर दी जिसे ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया। 17 सितंबर आते आते निज़ाम ने घुटने टेक दिए तथा इसी दिन उसने रेडियो पर अपने एक भाषण में भारत में विलय होने की बात कह दी, इस प्रकार हैदराबाद भारत का हिस्सा बना। राज्यों के पुनर्गठन के पश्चात हैदराबाद का अधिकतर भू भाग अन्य राज्यों में चल गया तथा हैदराबाद आंध्रप्रदेश राज्य की राजधानी बन गया। साल 2014 में तेलंगाना आंधप्रदेश से अलग होकर नया राज्य बना और हैदराबाद वर्तमान में तेलंगाना राज्य की राजधानी है।

Unification of India after Independence
निज़ाम द्वारा आत्मसमर्पण / Unification of India in Hindi

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