प्राचीन भारत के 10 एतिहासिक पर्यटन स्थल (10 Tourist Places of Ancient India)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे अनेक क्षेत्रों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। आज इस लेख में हम बात करेंगें प्राचीन भारत के दस महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की (Top 10 Tourist Places of ancient India) जो एतिहासिक दृष्टि से अपना एक अलग महत्व रखते हैं।

नालंदा विश्वविद्यालय

Nalanda University

नालंदा विश्वविद्यालय विश्व के प्राचीनतम तथा महानतम शिक्षा केंद्रों में से एक था जो वर्तमान भारत के बिहार राज्य में स्थित था। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त ने 415 से 455 ई.पू. के मध्य में की तथा गुप्त वंश के बाद के शासकों ने भी इसकी समृद्धि में अपना योगदान दिया इनमें हर्षवर्धन प्रमुख राजा थे।

विश्वविद्यालय के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी यहाँ बौद्ध धर्म की शिक्षा लेने आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से मिलती है। ह्वेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आए थे। एतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार विश्वभर से लोग शिक्षा लेने नालंदा आया करते थे, नालंदा विश्वविद्यालय में करीब 2000 आचार्य तथा 10,000 के करीब छात्र थे। यहाँ वेद, आयुर्वेद , राजनीति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, चिकित्सा , व्याकरण समेत अनेक विषयों को पढ़ाया जाता था। विश्वविद्यालय में एक विशाल पुस्तकालय था जो चार भागों धर्मरञ्जन, रत्नसागर, रत्नोंदधि, रत्नरंजक में विभाजित था।

भारत में इस्लाम के आगमन के बाद 1193 में बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को आग लगवा दी। यहाँ स्थित पुस्तकालय जिनमें 90 लाख के करीब विभिन्न विषयों की किताबें थी तीन महीनों तक जलती रही। वर्तमान में यहाँ केवल विश्वविद्यालय के अवशेष बचे हैं। हाँलकी इसी के नाम पर एक अन्य विश्वविद्यालय यहाँ से कुछ दूरी पर स्थापित करवाया गया है।

सारनाथ

सारनाथ

सारनाथ उत्तरप्रदेश राज्य के बनारस जिले में स्थित है। यह स्थान बौद्ध धर्म के लिए विशेष महत्व का है। 2500 वर्ष पूर्व ज्ञान प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं पर दिया। धीरे धीरे बौद्ध अनुयायियों की संख्या बड़ती गई और बौद्ध धर्म का प्रचार महाद्वीप के अलग अलग देशों में होने लगा। सारनाथ बौद्ध धर्म के चार पवित्र स्थानों में से एक है अन्य तीन स्थल लुम्बिनी, बोधगया तथा कुशीनगर हैं।

सारनाथ में आज भी प्राचीन इमारत के अवशेष बचे हैं इनमें सबसे खास धमेख स्तूप है जिसका निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया। कहा जाता है की स्तूप के भीतर बुद्ध के अवशेष हैं किन्तु इस बात के कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग देश विदेश से अधिक संख्या में यहाँ आते हैं।

खजुराहो

खजुराहो

खजुराहो भारत के मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित शहर है जो यहाँ के प्राचीन हिन्दू तथा जैन मंदिरों के लिए विश्व विख्यात है। इस शहर का इतिहास लगभग हज़ार वर्ष पुराना है जिसकी स्थापना चंदेल वंश के संस्थापक चंद्रवर्मन ने की थी। उन्होंने ही 950 से 1050 के मध्य खजुराहो मंदिरों का निर्माण करवाया। यह लगभग 85 मंदिरों का विशाल संग्रह था जिनमें से वर्तमान में कुल 25 शेष हैं।

इन मंदिरों को तीन क्षेत्रों पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी क्षेत्र में विभाजित किया गया है, परिसर के अधिकांश मंदिर पश्चिमी भाग में स्थित हैं वहीं पूर्वी भाग में जैन मंदिर तथा दक्षिणी भाग में कुछ अन्य मंदिर हैं। पश्चिमी तथा दक्षिणी भाग में हिन्दू देवी देवताओं के मंदिर हैं जिनमें भगवान शिव को समर्पित कंदरिया महादेव प्रसिद्ध है।

गौरतलब है कि पश्चिमी भाग को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल किया गया ही। ये मंदिर अपनी अद्भुत शिल्पकला तथा मूर्तिकला के लिए मशहूर हैं इन मंदिरों की दीवारों पर मानव की विभिन्न काम क्रीड़ाओं को खूबसूरती से दिखाया गया है कला के इस रूप को देखने देश विदेश से हज़ारों की संख्या में सैलानी प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं।

कार्ले चैत्य

कार्ले की गुफाएँ

कार्ले की गुफाएँ महाराष्ट्र के लोनावला में पश्चिमी घाट की पहाड़ियों पर स्थित हैं। यहाँ एक चैत्य (बौद्ध प्रार्थना स्थल) तथा तीन विहार (बौद्ध भिक्षुओं का निवास) हैं जिन्हें चट्टानों को काटकर बेहद खूबसूरती के साथ बनाया गया है। यहाँ स्थित चैत्य या पूजा स्थल आज भी सुरक्षित अवस्था में मिलता है, यह 124 फ़ीट 3 इंच लंबा, 45 फ़ीट 5 इंच चौड़ा तथा 46 फ़ीट ऊँचा है।

इन गुफाओं के निर्माण की बात करें तो ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इन गुफाओं का निर्माण 200 ई.पू. से 200 ई. के मध्य किया गया था,  अतः ये गुफाएँ अजंता तथा एलोरा की पूर्वगामी गुफाएँ हैं। दुनियाँभर से सैलानी वर्षभर इन्हें देखने यहाँ आते हैं।

पांडवलेनी

पाण्डवलेनि

पाण्डवलेनि को नासिक गुफओं के नाम से भी जाना जाता है। ये गुफाएँ महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित हैं। पाण्डवलेनि मुख्यतः 24 गुफाओं का एक समूह है, जिनको पहली शदी ई.पू. से तीसरी सदी ई. के मध्य में बनाया गया था। ये गुफाएँ बौद्ध भिक्षुओं के लिए चैत्यों तथा विहारों के रूप में बनाए गए थे। चैत्य उस स्थान को कहा जाता था जहाँ बौद्ध भिक्षु ध्यान किया करते थे वहीं विहार भिक्षुओं के निवास के लिए बनाए जाते थे। ये गुफाएँ वास्तुकला का नायाब उदाहरण हैं जिनमें चट्टानों को काटकर उनके भीतर भवनों का निर्माण किया गया है।

तक्षशिला

तक्षशिला

तक्षशिला प्राचीन काल में शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ स्थिति तक्षशिला विश्वविद्यालय प्राचीनतम शैक्षणिक संस्थानों में से एक था। भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह भारत के उत्तर पश्चिम में स्थिति गंधार राज्य की राजधानी थी। किन्तु आज़ादी के बाद बँटवारे में ये हिस्सा पाकिस्तान में चल गया। वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी जिले में स्थित है। तक्षशिला विश्विद्यालय की स्थापना लगभग 1000 ई. पू. की गई थी। यहाँ बनारस, उज्जैन, मिथिला आदि राज्यों से छात्र एवं राज्यों के राजकुमार शिक्षा ग्रहण करने जाया करते थे। प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ चाणक्य यहीं पर आचार्य थे।

भीम बेटका शैलाश्रय

भीमबेटका

भीमबेटका भारत के मध्यप्रदेश राज्य की राजधानी भोपाल से 45 किलोमीटर दक्षिणपूर्व में स्थित पुरापाषाणकाल का एक आवासीय पुरास्थल है। ये गुफाएँ आदि मानवों द्वारा बनाए गए गुफा चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ कुल 600 शैलाश्रय हैं जहाँ तत्कालीन मानव निवास करते थे इन्हीं गुफाओं में 275 शैलाश्रय चित्रों द्वारा सजाए गए हैं। यहाँ नृत्य, आखेट, घोड़े तथा हाथियों की सवारी तथा कई अन्य जानवरों को खनिज रंगों से चित्रित किया गया है।

इन गुफाओं की खोज सर्वप्रथम 1957 में डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा 1990 से इसे राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है इसके अतिरिक्त 2003 में यूनेस्को द्वारा भी इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है।

अजंता एलोरा गुफ़ाएं

अजंता तथा एलोरा की गुफ़ाएं

अजंता तथा एलोरा की गुफ़ाएं भारत के महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित हैं, जिन्हें चट्टानों को काट कर निर्मित किया गया है। अजंता की गुफाओं में 29 गुफ़ाएं शामिल हैं जिनमें 5 चैत्य तथा शेष विहार हैं। अजंता की इन गुफाओं में 200 ई.पू. से 650 ई. तक के बौद्ध धर्म का चित्रण किया या है, इसके अतिरिक्त गुफाओं की दीवारों में सुंदर अप्सराओं तथा राजकुमारियों का विभिन्न मुद्राओं में चित्रण किया गया है।

एलोरा की गुफ़ाएं अजंता की तुलना में बाद में निर्मित की गई हैं। इन गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकूटों नें 600 से 1000 ई. के मध्य करवाया था। यहाँ 34 गुफ़ाएं मौजूद हैं जिनमें 1 से 12 तक बौद्ध 13 से 29 तक ब्राह्मण तथा 30 से 34 तक जैन धर्म से संबंधित हैं। अजंता तथा एलोरा गुफ़ाएं यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल है।

मोहनजोदड़ों

मोहनजोदड़ो

मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित एक पुरातात्विक स्थल है, जिसका सिंधी भाषा में अर्थ मुर्दों का टीला होता है। इस स्थल की खोज सर्वप्रथम 1921 में राखलदास बनर्जी ने की। मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ से इस सभ्यता के बारे में अहम जानकारियाँ मिलती हैं। यह दुनियाँ का सबसे पुराना सुनियोजित शहर था जहाँ सड़के, गालियाँ, जल निकासी आदि की व्यवस्था थी।

यहाँ की गई खुदाई में बड़ी मात्रा में इमारतें, धातुओं की मूर्तियाँ, मुहरें आदि प्राप्त हुई हैं, खुदाई में प्राप्त हुआ एक स्नानागार प्रसिद्ध है जिसका प्रयोग धार्मिक स्नान के लिए किया जाता था। हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं (2500ईपू) में से एक है. इसका मुख्य स्थल सिंधु नदी घाटी थी। इसी लिए इसे सिंधु सभ्यता भी कहा जाता है।

बाहुबली मंदिर

गोमतेश्वर मंदिर

गोमतेश्वर मंदिर कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित जैन भगवान बाहुबली का मंदिर है जहाँ उनकी एक विशाल मूर्ति जिसकी ऊंचाई 57 फ़ीट है स्थापित की गई है। इसका निर्माण गंग सेनापति चामुंडराय ने सन 981 में करवाया था। इस मूर्ति की विशेषता यह है कि ये एक ही पत्थर में नक्काशी कर तैयार की गई है और इस प्रकार यह दुनियाँ की सबसे बड़ी मोनोलिथिक या एक ही पत्थर पर बनाई गई मूर्ति है।

भगवान बाहुबली जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र थे। अपने भाई भरत से युद्ध के पश्चात उन्होंने सन्यास ले लिया तथा एक वर्ष तक कायोत्सर्ग मुद्रा में अर्थात बिना हिले खड़े होकर तपस्या की जिससे उनके सम्पूर्ण शरीर में बेलें चढ़ गयी। उनकी इसी अवस्था को मूर्ति रूप में यहाँ स्थापित किया गया है। प्रत्येक 12 वर्षों में यहाँ भगवान बाहुबली का महामस्तकाभिषेक किया जाता है। यह जैन धर्म के मुख्य त्यौहारों में एक है तथा इस अवसर पर देश विदेश से जैन अनुयायी तथा सैलानी यहाँ आते हैं।

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