क्या है स्टारलिंक इंटरनेट प्रोजेक्ट? (SpaceX Starlink Project in Hindi)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे क्षेत्रों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। आज इस लेख में हम बात करेंगे SpaceX के सैटेलाइट इंटरनेट (SpaceX Starlink Project in Hindi) कार्यक्रम स्टारलिंक के बारे में तथा जानेंगे दुनियाँ और भारत पर इस कार्यक्रम का क्या प्रभाव पड़ेगा।

इंटरनेट क्या है?

इंटरनेट का सम्पूर्ण नाम इंटर-कनेक्टेड नेटवर्क है, यह विश्व भर के कम्प्यूटरों का एक जाल है जो किसी एक मुख्य कम्प्यूटर जहाँ कोई सूचना स्टोर होती है से जुड़े होते हैं तथा उस सूचना का आवश्यकता अनुसार उपयोग करते हैं। इस मुख्य कम्प्यूटर को सर्वर कहा जाता है। इंटरनेट के माध्यम से कनेक्टिविटी अब एक ‘विकल्प’ नहीं बल्कि सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। बिलों का भुगतान, यात्रा, किराने का सामान, भोजन, टेक्सटिंग समेत कई कार्यों के लिए हम इंटरनेट पर निर्भर है।

यह भी पढ़ेंइंटरनेट तथा इसकी कार्यप्रणाली को विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें। 

कार्यप्रणाली

आइए संक्षेप में समझते हैं इंटरनेट कैसे कार्य करत है। हमारे द्वारा उपयोग किया जाने वाला इंटरनेट ऑप्टिकल फाइबर केबल के द्वारा हम तक पहुँचता है। ये ऑप्टिकल फाइबर केबल समुद्र के अंदर बिछी होती है तथा सभी महाद्वीपों को आपस में जोड़ती हैं। आपके द्वारा इंटरनेट पर खोजी गई कोई भी सामग्री जैसे ऑडियो, वीडियो, चित्र, टेक्स्ट आदि दुनियाँ के किसी अन्य हिस्से में स्थित होती है जिसे समुद्र के अंदर बिछे इन्हीं तारों के माध्यम से आप तक पहुँचाया जाता है। उदाहरण के लिए आपके द्वारा YouTube पर देखी जाने वाली वीडियो अमेरिका में स्थित गूगल के किसी डेटा सेंटर में मौजूद होती है।

समुद्र में बिछे इन तारों का प्रबंधन करने वाली कंपनी तथा आपके मध्य आपका ISP (इंटरनेट सेवा प्रदाता) होता है, जो अधिकांश स्थितियों में आपके टेलिकॉम ऑपरेटर जैसे JIO, AIRTEL, IDEA आदि ही होते हैं। जब आप इंटरनेट पर किसी सामग्री को खोजते हैं तो वह समुद्र में बिछे तारों के माध्यम से आपके ISP तक पहुँचती है तथा आपके ISP द्वारा लगाए गए नजदीकी मोबाइल टावर के माध्यम से आपके फोन तक, तत्पश्चात आप उसे देख पाते हैं। टेलिकॉम कंपनियाँ ऑप्टिकल फाइबर की मदद से डेटा को दुनियाँभर में पहुँचाने वाली इन कंपनियों को डेटा हस्तांतरण के लिए भुगतान करती हैं तथा अंत में यह डेटा के शुल्क के रूप में आप से वसूला जाता है।

समुद्र के भीतर बिछी ऑप्टिकल-फाइबर केबल
समुद्र के भीतर बिछी ऑप्टिकल-फाइबर केबल

सैटेलाइट इंटरनेट

कई ग्रामीण तथा पहाड़ी क्षेत्र आज भी इंटरनेट, दूरसंचार जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। अधिकांश दुर्गम स्थानों में सड़क परिवहन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती जिसके चलते ऐसे स्थानों में मोबाइल टावर लगाना संभव नहीं है। इसके समाधान के तौर पर सैटेलाइट इंटरनेट एक अच्छा विकल्प बन सकता है।

सैटेलाइट का प्रयोग कर बिना किसी ऑप्टिकल-फाइबर केबल के डेटा भेजने तथा प्राप्त करने की सुविधा मिल सकेगी। हालांकि यह कार्य इतना आसान नहीं है। अधिकांश संचार उपग्रह 36,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित होते हैं अतः सैटेलाइट के माध्यम से डेटा हस्तांतरण में सूचना को लगभग 72,000 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ेगा जिससे निश्चित तौर पर इंटरनेट की गति प्रभावित होग।

किन्तु यदि ऐसे संचार उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षाओं में स्थापित कर दिए जाएं तो इस दूरी को कम किया जा सकता है किंतु इस स्थिति में कोई उपग्रह बहुत कम क्षेत्र ही कवर कर सकेगा। अतः सैटेलाइट इंटरनेट जैसे किसी प्रयोग को सफल बनाने के लिए अत्यधिक मात्रा में ऐसे सैटेलाइट की आवश्यकता होगी जो एक विस्तृत क्षेत्र को कवर कर सकें। इसमें अत्यधिक लागत एवं प्रबंधन की आवश्यकता होगी।

स्टारलिंक प्रोजेक्ट

स्टारलिंक (SpaceX Starlink Project in Hindi) स्पेस एक्स के मालिक एलॉन मस्क का एक कार्यक्रम है। जिसके तहत दुनियाँ के प्रत्येक कोने में सैटेलाइट से इंटरनेट उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्यक्रम के तहत लगभग 42,000 उपग्रह पृथ्वी की निम्न कक्षा (550 से 1,000 किलोमीटर के मध्य) में छोड़े जाएंगे जो पूरी पृथ्वी को कवर कर सकेंगे तथा दुनियाँ के किसी भी हिस्से में इंटरनेट को पहुँचाया जा सकेगा।

स्पेस एक्स का पहला स्टारलिंक मिशन 24 मई, 2019 को लॉन्च किया गया था, जिसमें 60 उपग्रह थे। कंपनी के पास 12,000 स्टारलिंक उपग्रहों को लॉन्च करने की मंजूरी है, और उसने अमेरिकी संघीय संचार आयोग (FCC) से अन्य 30,000 उपग्रहों के प्रक्षेपण को मंजूरी देने का अनुरोध किया है। 14 मार्च 2021 को भेजे गए 60 नए स्टारलिंक उपग्रहों समेत स्पेस एक्स लगभग 1,000 से अधिक उपग्रहों को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेज चुका है।

कैसे कार्य करेगा इंटरनेट?

स्पेस एक्स नें शुरुआती चरण में USA तथा कनाडा के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवा देना शुरू कर दिया है। सैटेलाइट के माध्यम से इंटरनेट का उपयोग करने के लिए एक डिश एंटिना की आवश्यकता होगी जो सिग्नल प्राप्त करने तथा प्रेषित करने का कार्य करेगा। इससे एक Wi-Fi राउटर जुड़ा होगा जो सामान्य राउटर की भाँति Wi-Fi सिग्नल प्रेषित करेगा जिससे स्मार्टफोन, कंप्यूटर आदि उपकरणों को जोड़कर इंटरनेट का उपयोग किया जा सकेगा। 

सैटेलाइट द्वारा वैक्यूम में डेटा का आदान-प्रदान होगा जिस कारण यह ऑप्टिकल फाइबर केबल की तुलना में 47% अधिक तेजी से गति कर सकेगा। वर्तमान में स्टारलिंक 50 mbps और 150 mbps के बीच इंटरनेट गति प्रदान कर रहा है, जिसमें 20ms से 40ms के बीच विलंबता या लेटेंसी है। हालांकि, 2021 में गति को 300 mbps तक पहुँचाने का लक्ष्य है, जबकि विलंबता 20ms तक कम हो जाएगी।

Starlink Project in Hindi
SpaceX Starlink Project in Hindi

प्रोजेक्ट से संभावित हानियाँ

हालांकि यह प्रयोग टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक नया कदम अवश्य साबित होगा किन्तु इसके कुछ नुकसान भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। अंतरिक्ष में सैटेलाइटों की बढ़ती संख्या से अंतरिक्ष में मलबा (Space Debris) भी बढ़ रहा है, जिससे अंतरिक्ष में उपस्थित सैटेलाइटों में टकराव की संभावना बनी रहती है। अत्यधिक मात्रा में पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद सैटेलाइट कई अंतरिक्ष शोध कार्यों को भी प्रभावित करेंगी।

स्टारलिंक प्रोजेक्ट (SpaceX Starlink Project in Hindi) के तहत भेजी जाने वाली सैटेलाइटों की संख्या कितनी अधिक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की 1957 में प्रारंभ हुए अंतरिक्ष युग (Space Age) से अभी तक केवल 9,000 के करीब सैटेलाइटें ही भेजी गई हैं जो 45,000 सैटेलाइटों की तुलना में कहीं कम है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों तथा खगोलशास्त्रियों का मानना है कि मानव निर्मित सैटेलाइटों के प्रेक्षण से प्रकाश प्रदूषण (रात में मानवजनित गतिविधियों द्वारा आकाश में अत्यधिक प्रकाश) का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

भारत पर प्रभाव

जैसा कि हमनें बताया स्टारलिंक प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका तथा कनाडा में यह सेवा प्रायोगिक तौर पर शुरू कर दी गयी है, जिसमे उपभोक्ता को एक डिश एंटीना लगाना होगा जो सैटेलाइट से कम्युनिकेशन करेगा। अमेरिका में इसके सेटअप की कीमत तकरीबन 500 डॉलर (लगभग 36,000 रुपये) रखी गयी है। इसके अलावा मासिक शुल्क 99 डॉलर (लगभग 7,200 रुपये) है।

यदि भारत की बात करें तो यहाँ JIO, AIRTEL, IDEA जैसी कंपनियाँ कहीं सस्ते दामों में इंटरनेट उपलब्ध करवा रहीं हैं। इसके अलावा भारत की अधिकांश आबादी इतने महँगे दामों में इंटरनेट इस्तेमाल करने में सक्षम भी नहीं है। स्टारलिंक सेवा के अगले साल से भारत में शुरू होने की संभावना है ऐसे में यह देखना होगा कि कंपनी भारत की अर्थव्यवस्था को देखते हुए अपनी कीमतों तथा सेवाओं में क्या बदलाव करती है।

वहीं यदि भारत की स्वदेशी परियोजनाओं की बात करें तो सरकार का इसरो के माध्यम से आने वाले समय में 5,000 दुर्गम गाँवों को सैटेलाइट इंटरनेट से जोड़ने का लक्ष्य है। इस परियोजना के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी Hughes India से समझौता भी कर लिया गया है। जबकि निजी क्षेत्र में एयरटेल द्वारा हाल ही में खरीदी गई कंपनी ONEWEB ने भी स्टारलिंक की तर्ज पर 2022 तक पूरे भारत में सैटेलाइट इंटरनेट उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है।

उम्मीद है दोस्तो आपको ये लेख (SpaceX Starlink Project in Hindi) पसंद आया होगा टिप्पणी कर अपने सुझाव अवश्य दें। अगर आप भविष्य में ऐसे ही अलग अलग क्षेत्रों के मनोरंजक तथा जानकारी युक्त विषयों के बारे में पढ़ते रहना चाहते हैं तो हमें सोशियल मीडिया में फॉलो करें तथा हमारा न्यूज़लैटर सब्सक्राइब करें। तथा इस लेख को सोशियल मीडिया मंचों पर अपने मित्रों, सम्बन्धियों के साथ साझा करना न भूलें।

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