नाविक: भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली | NavIC in Hindi

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नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे क्षेत्रों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। इस लेख में हम भारत की महत्वाकांक्षी स्वदेशी नौवहन (Navigation) कार्यक्रम (IRNSS : NavIC in Hindi) की चर्चा करेंगे तथा देखेंगे इस कार्यक्रम के पूर्ण होने के उपरांत भारत की किस प्रकार अमेरिकी GPS से निर्भरता कम होगी।

नौवहन प्रणाली (Navigation System in Hindi)

वर्तमान समय में जैसे-जैसे इंटरनेट पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है उसी के साथ हम जीपीएस पर भी बहुत हद तक निर्भर होते जा रहे हैं। चाहे वह किसी स्थान जैसे सूपरस्टोर, अस्पताल, रेस्टोरेंट, स्कूल, कॉलेज आदि का पता लगाना हो, ऑनलाइन ऑर्डर किए गए किसी उत्पाद को ट्रैक करना हो, Ola, Uber जैसी कैब की स्थिति को ट्रैक करना हो, कोई शिपमैन्ट आदि ट्रैक करना हो। इन सभी कार्यों के लिए एक नेविगेशन प्रणाली की आवश्यकता होती है। वर्तमान में हम जिस नेविगेशन प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं वह अमेरिका आधारित जीपीएस Global Positioning System (GPS) है बिना इसके लगभग अधिकांश ऑनलाइन सेवाओं का पूर्णतः लाभ ले पाना असंभव है।

क्या है जीपीएस? (GPS in Hindi)

GPS से हम सभी वाकिफ हैं। इसकी सहायता से कार्य करने वाले गूगल मैप जैसे उत्पादों का हम प्रतिदिन उपयोग करते हैं। इसकी शुरुआत संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना द्वारा 1960 के दशक में परमाणु मिसाइलों को ले जाने वाली अमेरिकी पनडुब्बियों को ट्रैक करने के लिए की गई। 1970 के दशक की शुरुआत में, अमेरिकी रक्षा विभाग (DoD) को भी एक मजबूत, स्थिर उपग्रह नेविगेशन प्रणाली की आवश्यकता महसूस हुई। 

नौसेना द्वारा पूर्व में विकसित तकनीक को अपनाते हुए, रक्षा विभाग ने अपने प्रस्तावित नेविगेशन सिस्टम को विकसित करने के लिए उपग्रहों का उपयोग करने का निर्णय लिया। DoD ने इसके बाद 1978 में टाइमिंग एंड रेंजिंग (NAVSTAR) उपग्रह के साथ अपना पहला नेविगेशन सिस्टम लॉन्च किया। यह 24 उपग्रह प्रणाली 1993 में पूरी तरह से चालू हो गई। वर्तमान में यह 32 उपग्रहों का एक नेटवर्क है जिसकी कवरेज़ पृथ्वी के कोने कोने में है।

GPS in Hindi

जीपीएस अंतरिक्ष-आधारित रेडियोनेविगेशन प्रणाली है जो पूर्णतः अमेरिकी सरकार के स्वामित्व में है और राष्ट्रीय सुरक्षा, वाणिज्यिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक जरूरतों को पूरा करने के लिए संयुक्त राज्य वायु सेना द्वारा इसे संचालित किया जाता है। जीपीएस वर्तमान में दो प्रकार की सेवाएं प्रदान करता है। जिसमें आम लोगों को प्रदान की जाने वाली नेविगेशन सेवाएं तथा अमेरिकी सेना और सरकारी एजेंसियों के इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित सेवाएं शामिल हैं। 

कैसे कार्य करता है जीपीएस? (How GPS Work in Hindi)

जीपीएस पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले 30 से अधिक नेविगेशन उपग्रहों की एक प्रणाली है। प्रत्येक उपग्रह रेडियो तरंगों के माध्यम से पृथ्वी में मौजूद जीपीएस उपकरण से संपर्क स्थापित करता है। जीपीएस की कार्यप्रणाली के विभिन्न चरणों को नीचे दिखाया गया है। 

चरण 1: जीपीएस उपग्रह रेडियो तरंगों को प्रसारित करता है जिसमें उपग्रह की लोकेशन, स्थिति, परमाणु घड़ी से प्राप्त प्रसारण के सटीक समय (t1) की सूचना होती है। ये सिग्नल प्रकाश की गति (लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड) से गति करते हैं।

चरण 2: धरती पर मौजूद जीपीएस उपकरण जैसे आपका स्मार्टफोन इन संकेतों को प्राप्त करता है तथा प्राप्त होने के समय (t2) के आधार पर रिसीवर तथा उपग्रह के मध्य की दूरी ज्ञात करता है।

चरण 3: जब जीपीएस उपकरण चार उपग्रहों से अपनी स्थिति की गणना कर लेता है तो ज्यामिति के माध्यम से अपनी भौगोलिक स्थिति की गणना कर पाता है। 

चरण 4: प्राप्त आंकड़ों जैसे अक्षांश, देशान्तर, ऊँचाई को उपकरण डिजिटल नक्शे  जैसे गूगल मैप में दर्शाता रहता है जिससे हमें अपनी भौगोलिक स्थिति का रियल टाइम में पता चल पाता है।

बेहतर नौवहन तकनीक में समय का महत्वपूर्ण योगदान है। उपग्रहों से आने वाले संकेत में 1 मिली सेकेंड की भी त्रुटि सैकड़ों किलोमीटर का अंतर पैदा कर सकती है। अतः समय की इसी त्रुटि को दूर करने के लिए इन उपग्रहों में परमाणु घड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है जो एक सेकेंड के 10 करोड़वें हिस्से की गणना करने की क्षमता रखती है।

सैटेलाइट नेविगेशन की यह तकनीक 3D Trilateration कहलाती है। इस प्रकार किसी जीपीएस उपकरण की स्थिति का सटीकता से पता लगाने के लिए पृथ्वी में मौजूद जीपीएस उपकरण का उस समय कम से कम 4 उपग्रहों से संपर्क स्थापित होना चाहिए।

Trilateration Technique | Credit: gisgeography

भारत की स्वदेशी नौवहन तकनीक (IRNSS in Hindi)

नौवहन प्रणाली हमारे डिजिटल जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है, किन्तु हम इस तकनीक के लिए बहुत हद तक अमेरिका के जीपीएस पर निर्भर हैं। इसी निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से भारत ने स्वदेशी नेविगेशन कार्यक्रम की शुरुआत की। 1999 में कारगिल घुसपैठ के दौरान भारत के पास उपग्रह नौवहन प्रणाली (NavIC in Hindi) मौजूद नहीं होने के कारण सीमापार से होने वाली  घुसपैठ का समय रहते पता नहीं लगाया जा सका।

हालाँकि भारत ने अमेरिका से GPS के माध्यम से सहायता करने का अनुरोध किया लेकिन अमेरिका ने मदद करने से इनकार कर दिया था। उसके बाद से ही GPS की तरह ही स्वदेशी नेविगेशन सेटेलाइट नेटवर्क के विकास पर ज़ोर दिया गया और इस पर इसरो के वैज्ञानिकों ने काम करना शुरू किया, जो अब पूरा हो चुका है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इसकी सेवा भारत के लोगों को मिलने लगेगी।

IRNSS : NavIC in Hindi
NavIC का सेवा क्षेत्र

इस सदी की शुरुआत में प्रारंभ हुए भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System) कार्यक्रम का नाम NavIC (Navigation with Indian Constellation) रखा गया है। इसके तहत इसरो ने कुल 7 उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए हैं जिनमें 3 उपग्रह भू-स्थिर कक्षा में तथा अन्य 4 भू-समकालिक कक्षा में मौजूद हैं। इस श्रृंखला में पहले उपग्रह IRNSS-1A का प्रक्षेपण जुलाई 2013 में किया गया, जबकि अंतिम उपग्रह IRNSS-1I 2018 में प्रक्षेपित किया गया। इन 7 उपग्रहों को भारत समेत देश की सीमा के बाहर 1500 कि.मी. के दायरे में आनेवाले सभी क्षेत्रों में सटीक स्थिति संबंधित सूचनाएं उपलब्‍ध कराने के लिए डिजाइन किया गया है।

नाविक का उपयोग

चूँकि जीपीएस तथा अन्य नौवहन तकनीकों द्वारा भारत के पास इनके इस्तेमाल की पूर्ण रूप से स्वायत्ता हासिल नहीं थी जिसका नुकसान हमें कारगिल युद्ध में भी देखने को मिला। किन्तु स्वदेशी प्रणाली (IRNSS in Hindi) होने के कारण भारत के पास इसका पूर्ण नियंत्रण होगा। इसरो के मुताबिक यह प्रणाली भी GPS की भाँति 2 तरह से सुविधायें प्रदान करेगी।

आम लोगों के लिए सामान्य नौवहन व स्थिति सेवा जबकि दूसरी प्रतिबंधित या सीमित सेवा जो मुख्यत: भारतीय सेना, भारतीय सरकार के उच्चाधिकारियों व अतिविशिष्ट लोगों व सुरक्षा संस्थानों के लिये होगी। इसके संचालन व रख रखाव के लिये भारत में लगभग 18 केन्द्र बनाये गये हैं। नाविक (NavIC in Hindi) तंत्र द्वारा मूल सेवा क्षेत्र में 20 मीटर से भी बेहतर स्थिति परिशुद्धता अपेक्षित की जा रही है। स्वदेशी नौवहन तकनीक का इस्तेमाल निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जाएगा।

  • स्‍थलीय, हवाई, महासागरीय दिशानिर्देशन
  • आपदा प्रबंधन
  • राष्ट्रीय सुरक्षा
  • सरकारी योजनाओं की रियल टाइम मैपिंग 
  • वाहन अनुवर्तन तथा बेड़ा प्रबंधन
  • मोबाइल फोन के साथ समाकलन
  • परिशुद्ध काल-गणना
  • मानचित्रण तथा भूगणतीय आंकड़ा अर्जन
  • पद यात्रियों तथा पर्यटकों के लिए  स्‍थलीय दिशानिर्देशन की सुविधा
  • चालकों के लिए दृश्‍य व श्रव्‍य दिशानिर्देशन की सुविधा

स्वदेशी तकनीक के फायदे

स्वदेशी नौवहन तकनीक के होने से हमारी अमेरिका के जीपीएस पर निर्भरता कम होगी। किसी सैन्य तथा सरकारी क्रियाकलापों के लिए भी भारत को किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त डेटा की सुरक्षा भी वर्तमान में एक अहम मुद्दा है, अतः स्वदेशी तकनीक के इस्तेमाल से कई महत्वपूर्ण डेटा सुरक्षित रहेगा।

स्वदेशी तकनीक की राह में चुनौतियाँ

हालाँकि नाविक वर्तमान में पूर्ण रूप से कार्यरत है किन्तु इसके बावजूद जनसामान्य नेविगेशन के लिए जीपीएस का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण नाविक समर्थित हार्डवेयर का उपलब्ध न होना है। स्वदेशी नौवहन प्रणाली (NavIC in Hindi) विकसित होने के साथ-साथ हमें ऐसे उपकरणों की भी आवश्यकता है जो नाविक समर्थित हों।

साल 2019 में मोबाइल प्रॉसेसर बनाने वाली कंपनी Qualcomm तथा  इसरो (ISRO) के मध्य NavIC समर्थित प्रॉसेसर बनाने पर समझौता किया गया है, जिसके बाद अब Qualcomm द्वारा लॉन्च किए जाने वाले प्रॉसेसर NavIC समर्थित होंगे। इस प्रॉसेसर युक्त स्मार्टफोन यूजर NavIC सुविधा का इस्तेमाल कर सकते हैं। वर्तमान में Snapdragon 720G, 662 and 460 प्रॉसेसर NavIC सपोर्टेड हैं।

जीपीएस तथा नाविक: कौन है बेहतर? (GPS Vs NavIC in Hindi)

अमेरिकी जीपीएस जैसा की नाम से स्पष्ट है एक वैश्विक नौवहन प्रणाली है जो पृथ्वी की कक्षाओं में मौजूद 32 उपग्रहों की सहायता से पृथ्वी के चप्पे चप्पे पर नज़र रख सकते हैं। वहीं भारत द्वारा विकसित नाविक (NavIC in Hindi) एक क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली (RPS) है जिसमें केवल 7 उपग्रहों का इस्तेमाल किया गया है और जो केवल भारत तथा इसके आस पास के क्षेत्रों को ही कवर करने में सक्षम हैं। अतः रेंज के मामले में जीपीएस नाविक से बेहतर है। 

किन्तु कुछ मायनों में भारत द्वारा निर्मित नाविक को बेहतर माना जा रहा है। इसका कारण यह है कि यह S और L-बैंड की दोहरी आवृत्ति पर कार्य करता है, जबकि जीपीएस केवल L-बैंड पर ही निर्भर है। इसके चलते वायुमंडल में किसी अवरोध की स्थिति में जीपीएस के प्रभावित होने की संभावना रहती है। जबकि नाविक में दोहरी आवृत्ति (S और L बैंड) के बैंड होने के कारण यह जीपीएस से अधिक कार्यकुशल है।

गौरतलब है कि बैंड से आशय तरंगों की आवृत्ती से है। L-बैंड 15-30 सेमी की तरंग दैर्ध्य और 1-2 गीगाहर्ट्ज़ की आवृत्ति पर काम करते हैं। L-बैंड का उपयोग ज्यादातर स्पष्ट वायु में किया जाता है। जबकि S-बैंड 8-15 सेमी की तरंग दैर्ध्य और 2-4 गीगाहर्ट्ज़ की आवृत्ति पर काम करते हैं। अधिक आवृत्ति के कारण, S-बैंड की तरंगें आसानी से प्रभावित नहीं होती हैं। 

स्वदेशी नौवहन युक्त अन्य देश

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने भारत द्वारा निर्मित NavIC को अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर खरा पाते हुए RPS के रूप में मान्यता प्रदान की है। इसी के साथ भारत इस तकनीक युक्त विश्व में चौथा देश बन गया है। भारत के अतिरिक्त वर्तमान में केवल 3 देशों तथा युरोपियन यूनियन के पास अपनी नौवहन तकनीक है। हालाँकि इनमें वैश्विक नौवहन प्रणालियाँ केवल अमेरिकी GPS तथा रूसी GLONASS ही हैं।

  • अमेरिका : GPS 
  • रूस : GLONASS 
  • चीन : BEIDOU
  • युरोपियन यूनियन : GALILEO
  • भारत : NavIC

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