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संज्ञेय एवं असंज्ञेय अपराध (Cognizable and Non-Cognizable offences)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे क्षेत्रों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। इस लेख में हम चर्चा करेंगे कानून के एक महत्वपूर्ण विषय संज्ञेय तथा असंज्ञेय अपराधों के बारे में और देखेंगे इनके प्रावधानों में क्या अंतर हैं। (Cognizable and Non-Cognizable offences)

संज्ञेय अपराध (Cognizable offence)

संज्ञेय अपराधों के बारे में Criminal Procedure Code (CrPC) सेक्शन 2(c) में बताया गया है। इसके अनुसार ऐसे अपराध जो गंभीर प्रकृति के हैं उन्हें संज्ञेय अपराधों की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे अपराधों की स्थिति में पुलिस आरोपी की गिरफ्तारी बिना वारंट के कर सकती है। उदाहरण की बात करें तो इसके अंतर्गत हत्या, अपहरण, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।

असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable offence)

इन अपराधों का जिक्र CrPC के सेक्शन 2(l) में किया गया है। ये साधारणतः कम गंभीर अपराध होते हैं। इस प्रकार के अपराध की स्थिति में पुलिस आरोपी की गिरफ्तारी बिना वारंट के नहीं कर सकती है। गिरफ्तारी के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट से वारंट जारी करवाना आवश्यक होता है। इसके उदाहरणों में किसी की धार्मिक भावना आहत करना, जालसाजी, मानहानि आदि मामले शामिल हैं। 

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संज्ञेय एवं असंज्ञेय अपराधों में अंतर

संज्ञेय अपराध की स्थिति में पुलिस बिना किसी न्यायालय की अनुमति के मामले की जाँच शुरू कर सकती है जबकि असंज्ञेय अपराध की स्थिति में जब तक न्यायिक मजिस्ट्रेट जाँच के आदेश न दे पुलिस को जाँच करने का अधिकार नहीं होता है। इसके अतिरिक्त संज्ञेय अपराध की शिकायत First Information Report (FIR) रजिस्टर में दर्ज की जाती है वहीं असंज्ञेय अपराधों की शिकायत Non Cognizable Register (NCR) रजिस्टर में लिखी जाती हैं। 

जमानती एवं गैर जमानती अपराध (Bailable and Non Bailable offence)

जमानत के आधार पर भी अपराधों को दो श्रेणियों (जमानती एवं गैर जमानती) में विभाजित किया गया है। इनका उल्लेख CrPC के सेक्शन 2(a) में किया गया है। जमानती अपराध वे अपराध होते हैं जिनमें आरोपी या अभियुक्त को जमानत पुलिस थाने से ही दे दी जाती है। ऐसे आरोपी को जमानत दिया जाना उसका मूल अधिकार है।

वहीं ग़ैर जमानती अपराध की स्थिति में जमानत प्राप्त करना अभियुक्त का मूल अधिकार नहीं रह जाता। पुलिस के लिए ऐसे अभियुक्त को 24 घण्टों के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य होता है। इसके पश्चात मजिस्ट्रेट अपराध के अनुसार अभियुक्त को जमानत या पुलिस रिमांड पर भेजते हैं। CrPC की अनुसूची एक में विभिन्न प्रकार के अपराधों की प्रकृति (संज्ञेय अथवा असंज्ञेय एवं जमानती अथवा गैर जमानती) के बारे में बताया गया है।

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