जानें क्या होता है मुद्रा विनिमय समझौता (Currency Swap Agreement) तथा इसके इस्तेमाल के क्या फायदे हैं?

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मुद्रा विनिमय (Currency Swap)

मुद्रा विनिमय विभिन्न प्रकार के डेरिवेटिव वित्तीय उत्पादों में एक है, मुद्रा विनिमय से आशय मुद्राओं को अपास में बदलने से है। इसमें दो भिन्न देशों से संबंधित लोग अथवा संस्थाएं अपनी आवश्यकतानुसार किसी निश्चित राशि को एक निश्चित समय के लिए एक दूसरे की मुद्राओं में तत्कालीन विनिमय दर के अनुसार बदल देती हैं।

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कोई भी दो लोग, संस्थाएं, कंपनियाँ आदि ऐसा करती हैं, क्योंकि उन्हें व्यापार आदि हेतु एक दूसरे की मुद्रा की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार मुद्रा विनिमय के और भी फायदे हैं, जिनकी चर्चा नीचे की गई है।

मुद्रा विनिमय समझौते की प्रक्रिया

आइए इसकी कार्यप्रणाली को एक उदाहरण की सहायता से समझते हैं। मान लें “रमेश” जो कि, एक भारतीय उद्योगपति है को अमेरिका में अपनी एक फर्म के लिए एक लाख अमेरिकी डॉलर की पाँच वर्षों के लिए आवश्यकता है। एक डॉलर को 75 रुपयों के बराबर समझा जाए तो एक लाख अमेरिकी डॉलर की रुपयों में कीमत 75 लाख रुपये होगी। वहीं “स्टीव” जो कि, एक अमेरिकी उद्योगपति है को भारत में अपनी किसी कंपनी के खर्च के लिए 75 लाख भारतीय रुपयों की 5 वर्षों के लिए आवश्यकता है

रमेश यदि किसी अमेरिकी बैंक से ऋण लेता है तो उसे स्टीव की तुलना में अधिक ब्याज चुकाना पड़ेगा इसके अतिरिक्त यदि भविष्य में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ तो रमेश को ब्याज तथा मूलधन के रूप में अधिक भुगतान करना पड़ेगा। इसके अलावा स्टीव को भी भारतीय बैंक से ऋण लेने पर रमेश की तुलना में अधिक ब्याज देना होगा। उदाहरण के तौर पर माना रमेश को भारत में 75 लाख रुपयों तथा अमेरिका में 1 लाख डॉलर का ऋण क्रमशः 10% तथा 8% की वार्षिक ब्याज दर पर मिलता है, जबकि स्टीव को यही ऋण 15% तथा 6% की सालाना ब्याज दर पर प्राप्त होता है।

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यदि स्टीव अपने देश में किसी बैंक से एक लाख डॉलर का ऋण लेकर रमेश की अमेरिका स्थित फर्म को दे तथा बदले में रमेश किसी भारतीय बैंक से 75 लाख रुपयों का ऋण लेकर स्टीव की भारत स्थित कंपनी को दे दे, तो इस प्रकार दोनों को सस्ती ब्याज दरों में ऋण प्राप्त हो जाएगा। वर्ष के अंत में रमेश 75 लाख पर 10% के अनुसार 7,50,000 रुपयों का ब्याज अपने बैंक को अदा करेगा वहीं स्टीव एक लाख डॉलर पर 6% के अनुसार 6,000 डॉलर का भुगतान अपने बैंक को करेगा।

इसके पश्चात स्टीव की भारत स्थित कंपनी रमेश को 7,50,000 रुपयों का भुगतान करेगी जो उसने स्टीव को दिए गए ऋण की एवज़ में चुकाए हैं एवं रमेश की अमेरिका स्थित फर्म स्टीव को 6,000 डॉलर अदा करेगी जो उसने रमेश के लिए गए ऋण के ब्याज के रूप में दिए थे। इस प्रकार पाँच वर्षों की अवधि तक प्रत्येक वर्ष बैंकों को दिए गए ब्याज का भी दोनों कंपनियों द्वारा विनिमय कर लिया जाएगा।

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पाँच वर्षों की अवधि के पश्चात रमेश एक लाख डॉलर का मूलधन स्टीव को लौटाएगा और स्टीव 75 लाख रुपयों का मूलधन रमेश को वापस करेगा। यह पूरी व्यवस्था मुद्रा विनिमय (Currency Swap) कहलाती है। मूलधन को लौटाने के समय रुपये तथा डॉलर की विनिमय दर पूर्व में भी निर्धारित की जा सकती है या तत्कालीन दर पर भी विनिमय किया जा सकता है।

इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण फायदा यह है कि, इसके द्वारा मुद्रा को देश के बाहर भेजने की आवश्यकता नहीं होती। इसके अतिरिक्त यदि रमेश भारत के बजाए अमेरिका से ऋण लेता तो उसे प्रतिवर्ष ब्याज के रूप में 8,000 डॉलर चुकाने पड़ते किन्तु यदि रुपया समय के साथ डॉलर के मुकाबले कमज़ोर हुआ तो इन 8,000 डॉलर के ब्याज हेतु रमेश को अधिक रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी।

देशों के मध्य मुद्रा विनिमय समझौते

लोगों के अलावा विभिन्न देशों की सरकारें भी इसका उपयोग करती हैं। जैसा कि, आप जानते हैं वर्तमान में अमेरिकी डॉलर एक प्रमुख वैश्विक मुद्रा के रूप में प्रचलन में है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए किसी भी देश को डॉलर की आवश्यकता होती है अतः सभी देशों के लिए विदेशी मुद्रा भंडार में अधिक मात्रा में डॉलर हो यह अहम हो जाता है। इस प्रकार माँग बड़ने के कारण अमेरिकी डॉलर अन्य देशों की घरेलू मुद्रा की तुलना में मजबूत होता जाता है तथा वैश्विक बाजार में अमेरिकी मुद्रा का प्रभुत्व एवं एकाधिकार बढ़ता है।

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किसी आर्थिक संकट या व्यापार घाटे की स्थिति में देश के केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा भंडार से उसकी भरपाई करनी पड़ती है ताकि उस देश की घरेलू मुद्रा और डॉलर की विनिमय दर स्थिर बनी रहे। किंतु यदि आर्थिक संकट बड़ा हो अर्थात विदेशी मुद्रा भंडार में उपलब्ध डॉलर से भी जब घाटे की पूर्ति न कि जा सके तब ऐसी स्थिति में IMF जैसी संस्थाओं या किसी देश से ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती है, साल 1991 में आया आर्थिक संकट इसका उदाहरण है।

समझौते की आवश्यकता

हमने आर्थिक संकट से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ऋण की चर्चा की किन्तु विदेशी मुद्रा में ऋण लेने का एक मुख्य नुकसान यह है की भविष्य में यदि भारतीय रुपया डॉलर की तुलना में कमजोर हुआ तो भारत को ऋण में ली गई राशि से अधिक मूलधन चुकाना पड़ेगा। इसके अलावा उच्च ब्याज दर भी एक महत्वपूर्ण समस्या है।

इन्हीं समस्याओं के समाधान के रूप में मुद्रा विनिमय या Currency Swap समझौता सामने आया है। इसके तहत कोई दो देश यह समझौता करते हैं कि, किसी निश्चित सीमा तक वे देश निर्धारित विनिमय दर (Exchange Rate) तथा कम ब्याज पर एक दूसरे की घरेलू मुद्रा या कोई तीसरी मुद्रा जैसे डॉलर खरीद सकेंगे।  

भारत की स्थिति

साल 2018 में भारत तथा जापान के मध्य 75 बिलियन डॉलर का मुद्रा विनिमय समझौता (Currency Swap Agreement in Hindi) हुआ है। इसके अनुसार भारत अल्पकालिक आवश्यकताओं की पूर्ति या व्यापार घाटे की परिस्थिति में अपनी मुद्रा देकर जापान से 75 बिलियन डॉलर तक की राशि के येन या डॉलर तय विनिमय दर पर एक निश्चित अवधि के लिए खरीद सकता है।

अवधि पूर्ण हो जाने पर जापान भारत को उसकी मुद्रा लौटाकर दिए गए डॉलर या येन वापस ले लेगा जैसा की हमने रमेश तथा स्टीव के उदाहरण में देखा। इसके अतिरिक्त सार्क देशों के साथ भी 2 बिलियन डॉलर का समझौता करने का लक्ष्य है, जिसके चलते जुलाई 2020 में श्रीलंका से 400 मिलियन डॉलर का मुद्रा विनिमय समझौता किया जा चुका है।

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