जानें उपहारों पर लगने वाले कर (Tax on Gifts) तथा इससे संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी

प्रत्येक सरकारें देश के नागरिकों से उनकी आय का एक हिस्सा प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) के रूप में वसूलती हैं, जिससे देश की सम्पूर्ण आर्थिक गतिविधियों का संचालन होता है और देश में विकास कार्य सम्पन्न हो पाते हैं। कोई व्यक्ति अलग-अलग तरीकों से आय अर्जित कर सकता है, जैसे वेतन के रूप में, व्यवसाय के रूप में, निवेश के प्रतिफल के रूप में आदि। आय के इन्हीं स्रोतों में एक स्रोत किसी व्यक्ति को मिलने वाले उपहार या गिफ्ट्स भी हैं।

हालाँकि कोई भी उपहार उसकी कीमत के विपरीत भावनात्मक रूप से अधिक महत्व का होता है अतः यह प्रश्न उठना भी लाज़मी है, आखिर सरकारें उपहारों पर कर क्यों वसूलती हैं? उपहारों को किसी व्यक्ति की आय समझकर उस पर कर आरोपित करने के पीछे सरकारों का उद्देश्य किसी व्यक्ति की भावनाओं को आहत करना नहीं है, बल्कि ऐसा करने का मुख्य कारण कर चोरी पर लगाम लगाना तथा काले धन को रोकना है, जिसे हम आगे विस्तार से समझेंगे।

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में। आज इस लेख के माध्यम से हम चर्चा करेंगे उपहारों पर लगने वाले टैक्स (Tax on Gifts in India) की, देखेंगे किन परिस्थितियों में किसी उपहार पर कर अथवा टैक्स लगाया जाता है, लगाया जाने वाला कर कितना होता है तथा किन परिस्थितियों अथवा व्यक्तियों से मिले उपहार कर के दायरे से बाहर होते हैं?

उपहारों पर कर की व्यवस्था

कुछ परिस्थितियों को छोड़कर उपहारों पर कर (Tax on Gifts in India) की व्यवस्था सर्वप्रथम 1958 में उपहार कर अधिनियम, 1958 के द्वारा शुरू की गई। इन उपहारों में नकद (Cash), डिमांड ड्राफ्ट, चेक, कोई चल एवं अचल संपत्ति आदि शामिल थे। 1998 में इस कानून को समाप्त कर दिया गया तथा सभी प्रकार के उपहार कर के दायरे से बाहर हो गए।

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साल 2004 में वित्त अधिनियम, 2004 के माध्यम से उपहारों पर लगाए जाने वाले करों को और विनियमित कर इन्हें नए रूप में प्रस्तुत किया गया तथा अलग कानून बनाने के बजाए इसे आयकर अधिनियम (Income Tax Act) के अधीन कर दिया गया। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 56(2)(x) में उपहारों पर लगने वाले करों तथा इसके संबंध में अन्य प्रावधान किये गए हैं, जिन्हें हम आगे विस्तार से समझेंगे।

किन परिस्थितियों में लागू होती है धारा 56(2)(x)?

आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) के पहले खंड 56(2)(x)(a) में कुछ शर्तों का उल्लेख किया गया है। किसी उपहार पर करों के आरोपण के लिए इन सभी शर्तों का लागू होना आवश्यक है, यदि इनमें से कोई भी शर्त लागू न होती हो तब उस स्थिति में किसी उपहार पर कर नहीं लगाया जा सकता है। आइए जानते हैं इन शर्तों को

उपहारों (Gifts) का प्रकार

कोई व्यक्ति, जिसे कोई उपहार प्राप्त होता है, उसके लिए वह उपहार पूँजीगत परिसंपत्ति (Capital Asset) होनी चाहिए। पूँजीगत परिसंपत्ति की परिभाषा आयकर अधिनियम की धारा 2(14) में दी गई है। इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार की चल (Movable) एवं अचल (Immovable) संपत्ति जैसे भूमि, भवन, प्रतिभूतियाँ (शेयर, बॉन्ड, डिबेंचर्स), आभूषण इत्यादि शामिल हैं।

गौरतलब है कि, कुछ संपत्तियों को पूँजीगत परिसंपत्ति की श्रेणी से बाहर रखा गया है, जैसे कृषि भूमि (शहरी को छोड़कर), ऐसी सभी संपत्तियाँ, जिन्हें Stock-in-Trade अर्थात व्यापार के उद्देश्य से खरीदा गया है, निजी इस्तेमाल की जाने वाली कोई भी चल संपत्ति जैसे कार, घड़ी आदि।

चाँदी, सोना, प्लेटिनम या किसी अन्य कीमती धातु से बने आभूषण, कीमती पत्थर , पुरातात्विक संग्रह, चित्र, पेंटिंग, मूर्तियां अथवा कला के किसी भी रूप को पूंजीगत परिसंपत्ति (Capital Asset) माना जाएगा, भले ही इसका उपयोग व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए किया गया हो

कर (Tax) के अधीन आने वाले उपहार

इसके तहत ऐसे उपहारों को उल्लिखित किया गया है, जिन पर कर आरोपित किया जा सकता है इनके अतिरिक्त कोई अन्य उपहार कर के दायरे से बाहर होंगे। इन उपहारों में किसी भी माध्यम (नकद, चैक, डिमांड ड्राफ्ट) से प्राप्त मुद्रा, अचल संपत्ति (भूमि/भवन), चल संपत्ति (पेंटिंग, पुरातात्विक संग्रह, मूर्तियाँ, कला का कोई अन्य रूप, चित्र, आभूषण, बुलियन, प्रतिभूतियाँ जैसे शेयर, बॉन्ड आदि) शामिल हैं।

उपहार प्राप्त करने के माध्यम

इसमें उपहार लेने के माध्यमों के बारे में बताया गया है, इसके अनुसार यदि कोई भी उपहार यहाँ उल्लिखित माध्यमों से प्राप्त हुआ हो तो वह टैक्स के दायरे से बाहर होगा। इन माध्यमों में अपनी शादी पर प्राप्त उपहार, वसीयत अथवा विरासत में मिली संपत्तियाँ शामिल हैं।

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इसके अलावा आयकर अधिनियम की धारा 47 के अंतर्गत किये गए कुछ चुनिंदा लेन-देन जैसे हिन्दू अविभाजित परिवार (HUF) के पूर्ण या आंशिक विभाजन पर किसी संपत्ति का वितरण, किसी पैरेंट कंपनी द्वारा अपनी सहायक कंपनी को अथवा सहायक कंपनी द्वारा पैरेंट कंपनी को हस्तांतरित की गई कोई भी संपत्ति, जबकि जिसे संपत्ति प्राप्त हुई है वह भारतीय कंपनी हो, कुछ स्थितियों को छोड़कर किसी कंपनी के विभाजन अथवा समायोजन की स्थति में होने वाले सभी हस्तांतरण उपहार करों (Tax on Gifts in India) के अधीन नहीं होंगे।

उपहार देने वाले व्यक्ति

इसके तहत उपहार देने वाले व्यक्तियों के संबंध में प्रावधान हैं, यदि कोई उपहार देने वाला व्यक्ति इस शर्त में उल्लिखित कोई व्यक्ति है तो उपहार प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर टैक्स नहीं लगाया जाएगा। इन व्यक्तियों में नजदीकी संबंधी, स्थानीय प्राधिकरण (पंचायत, नगरपालिका आदि), कोई फाउंडेशन, विश्वविद्यालय, अस्पताल, ट्रस्ट आदि, जो आयकर की धारा 10(23C), 12A, 12AA में वर्णित हैं।

गौरतलब है कि, कानून में नजदीकी संबंधियों को परिभाषित किया गया है। किसी HUF की स्थिति में HUF के सभी सदस्य संबंधियों की श्रेणी में आएंगे, जबकि किसी व्यक्ति (Individual) के लिए निम्नलिखित व्यक्तियों को ही उसका संबंधी समझा जाएगा-

  • जीवनसाथी (Spouse) एवं व्यक्ति के माता-पिता
  • ऊपर वर्णित व्यक्तियों के भाई-बहन (जीवनसाथी के भाई-बहन एवं माता-पिता के भाई बहन)
  • व्यक्ति अथवा जीवनसाथी के Lineal Ascendant तथा Lineal Descendant
  • ऊपर वर्णित सभी व्यक्तियों के जीवनसाथी

उपहार प्राप्त करने वाला

ऊपर हमनें उपहार देने वाले व्यक्तियों के विषय में जाना यहाँ उपहार प्राप्तकर्ता के बारे में बताया गया है। कोई व्यक्ति या निकाय, जो इस शर्त में वर्णित है उसे प्राप्त कोई भी उपहार कर से मुक्त होगा। इनमें धारा 10(23C)(iv)(v)(vi)(via) के तहत आने वाले निकाय जैसे शैक्षणिक संस्थान, ट्रस्ट, अस्पताल, फाउंडेशन आदि शामिल हैं।

यदि किसी व्यक्ति के “ऊपर वर्णित किसी संबंधी” द्वारा कोई ट्रस्ट केवल इस उद्देश्य से बनाया जाता है, कि वह उस व्यक्ति को कोई संपत्ति हस्तांतरित कर सके दूसरे शब्दों में संबंधी स्वयं उपहार न देकर इस उद्देश्य से किसी ट्रस्ट का निर्माण करता है, तब इस स्थिति में भी ट्रस्ट द्वारा व्यक्ति को दिया गया उपहार कर मुक्त होगा।

उपहार की कीमत

इस शर्त के अनुसार किसी व्यक्ति को प्राप्त हुए उपहार के मूल्य की एक सीमा निर्धारित की गई है, यदि प्राप्त हुआ कोई उपहार अधोलिखित सीमा से अधिक मूल्यवान हो, तभी उस पर टैक्स लगाया जा सकता है। उपहारों पर लगाया जाने वाला कर आयकर की विभिन्न टैक्स दरों के अनुसार “अन्य स्रोतों से प्राप्त आय” के रूप में देय होता है। अलग-अलग उपहारों की स्थिति में निर्धारित सीमा निम्नलिखित है-

  • किसी भी माध्यम से प्राप्त मुद्रा 50,000 रुपयों से अधिक नहीं होनी चाहिए, अधिक होने की स्थिति में सम्पूर्ण राशि पर कर लगाया जाएगा।
  • उपहार के रूप में प्राप्त सभी प्रकार की चल संपत्तियों, का कुल मूल्य (Fair Market Value) 50,000 रुपयों से अधिक नहीं होनी चाहिए, अधिक होने की स्थिति में संपत्ति की कुल कीमत पर कर लगाया जाएगा।
  • एक वित्त वर्ष के दौरान प्राप्त सभी प्रकार की चल संपत्तियों, जिसे प्राप्त करने की एवज में कुछ राशि का भुगतान किया गया हो, किन्तु यह राशि उस संपत्ति की कुल कीमत या फेयर मार्केट वैल्यू से कम हो, तब ऐसी स्थिति में दोनों के मध्य अंतर (Fair Market ValueAmount Paid) 50,000 रुपयों से अधिक नहीं होना चाहिए, अधिक होने की स्थिति में कुल अंतर पर टैक्स लगाया जाएगा।
  • उपहार के रूप में प्राप्त किसी भी प्रकार की अचल संपत्ति का कुल मूल्य (Stamp Duty Value) 50,000 रुपयों से अधिक नहीं होना चाहिए अधिक होने की स्थिति में SDV के अनुसार संपत्ति की कुल कीमत पर कर लगाया जाएगा। गौरतलब है कि, चल संपत्ति के विपरीत अचल संपत्ति की स्थिति में 50,000 की सीमा प्रत्येक अचल संपत्ति के लिए अलग-अलग दी जाती है।
  • एक वित्त वर्ष के दौरान प्राप्त किसी प्रकार की अचल संपत्ति, जिसे प्राप्त करने की एवज में कुछ राशि का भुगतान किया गया हो, किन्तु यह राशि उस संपत्ति की कुल कीमत या स्टाम्प ड्यूटी वैल्यू से कम हो, तब ऐसी स्थिति में दोनों के मध्य अंतर (Stamp Duty Value – Amount Paid) 50,000 रुपयों अथवा भुगतान की गई धनराशि के 5%, जो भी अधिक हो से अधिक नहीं होनी चाहिए, अधिक होने की स्थिति में कुल अंतर पर टैक्स लगाया जाएगा।

क्यों लगाया जाता है उपहारों पर कर?

जैसा कि, हमनें ऊपर बताया उपहारों पर कर (Tax on Gifts in India) लगाने के पीछे सरकारों का मुख्य उद्देश्य कर की चोरी को रोकना तथा काले धन के इस्तेमाल को खत्म करना है। आइए एक उदाहरण की सहायता से समझने का प्रयास करते हैं कैसे, उपहारों की आड़ में कर की चोरी की जाती है।

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माना कोई व्यक्ति “A” अपना प्लॉट, जिसकी कीमत (SDV) एक करोड़ रुपये है को बेचने का निर्णय लेता है, A का एक मित्र “B” यह जमीन खरीदना चाहता है, किन्तु उसके पास केवल 50 लाख रुपये हैं, जबकि अन्य 50 लाख काले धन के रूप में मौजूद है। ऐसे में दोनों एक समझौता करते हैं, जिसके अनुसार यह तय होता है, कि A आधिकारिक तौर पर अपनी जमीन B को 50 लाख में बेचेगा, जबकि B बांकी बचे 50 लाख नकद (Cash) के रूप में देगा जो कि, काला धन है।

इस पूरी व्यवस्था से A तथा B दोनों लाभान्वित होते हैं, A के फायदे को देखें तो उसे जमीन की बिक्री पर, जो कैपिटल गेन टैक्स सामान्य स्थिति में एक करोड़ पर चुकाना पड़ता अब केवल 50 लाख पर ही देना होगा, जबकि B को यह लाभ हुआ कि, उसे उसका काला धन इस्तेमाल करने का अवसर मिल गया। इसी प्रकार कई अन्य तरीकों से मुद्रा तथा संपत्ति का हस्तांतरण उपहारों के नाम पर किया जाता था, जिसे विनियमित करने के लिए उपहारों पर कर की व्यवस्था की गई।

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