गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA) क्या होती हैं तथा भारत में इन्हें बढ़ने से रोकने के लिए क्या उपाय किया गए हैं?

नमस्कार दोस्तो! स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे क्षेत्रों से महत्वपूर्ण एवं रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। आपने हालिया समय में अक्सर समाचारों आदि में बैंकों के बढ़ते NPA के बारे में अवश्य सुन होगा, भारतीय बैंकों का बढ़ता NPA देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद नुकसानदायक है। आज इस लेख के माध्यम से हम चर्चा करेंगे NPA अथवा गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (Non Performing Assets) की और समझेंगे इसके कारण, प्रभाव तथा इससे निपटने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को।

गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA)

बैंकिंग व्यवस्था से आप सभी परिचित हैं, हमनें एक लेख में भी इसे विस्तार से समझाया है, जिसे आप नीचे दी गई लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं। बैंकिंग व्यवस्था में मुख्यतः जमा स्वीकार किया जाता है तथा ग्राहकों को उचित ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

बैंकों द्वारा ग्राहकों को दिया गया ऋण बैंकों की परिसंपत्ति (ऐसी संपत्ति जो आय का सृजन करे) है, जिससे उन्हें ब्याज के रूप में आय प्राप्त होती है। बैंकों द्वारा दिया गया ऐसा ऋण, जिसका ब्याज अथवा मूलधन 90 या उससे अधिक दिनों से बैंक को नहीं चुकाया गया हो गैर निष्पादित परिसंपत्ति (Non Performing Asset) कहलाता है।

दिनों का यह मानक कुछ विशेष क्षेत्रों के लिए भिन्न है उदाहरण के तौर पर कृषि के लिए लिया गया अल्पकालिक फसल ऋण, जिसका ब्याज अथवा मूलधन ऐसी दो फसली मौसमों से जमा न किया गया हो NPA की श्रेणी में आता है, जबकि कृषि के लिए लिया गया दीर्घकालिक फसल ऋण जिसका ब्याज या मूलधन ऐसी एक फसली मौसम से न दिया गया हो NPA कहलाता है।

NPAs का वर्गीकरण

किसी ऋण के NPA घोषित हो जाने पर उसे समय के अनुसार पुनः निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जाता है। 

  1. Sub-Standard Asset (ऐसी परिसमपत्ति जो 1 वर्ष की अवधि से NPA हो)
  2. Doubtful Assets (ऐसी परिसमपत्ति जो एक वर्ष की अवधि से अधिक समय से पूर्व की श्रेणी में हो)
  3. Loss Assets (ऐसी परिसमपत्ति जो 36 माह की अवधि से NPA हो। इस श्रेणी में आने वाली परिसमपत्ति को साधारणतया हानि मान लिया जाता है)

NPA बढ़ने के मुख्य कारण

  1. कृषि क्षेत्र के NPA का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र की अनिश्चितता एवं किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य न मिलना है।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का खराब प्रबंधन भी इसके मुख्य कारणों मे से एक है। 
  3. औधोगिक उत्पादन में कमी के चलते कम्पनियाँ ऋण समय पर भुगतान नहीं कर पाती, जिससे NPA बढ़ता है।
  4. वैश्विक मंदी, महामारी आदि के चलते भी कम्पनियाँ समय पर ऋण भुगतान नहीं कर पाती। इसका ताज़ा उदाहरण हमारे सामने है। वैश्विक महामारी घोषित कोविड-19 के चलते कई छोटे उद्योग बंद हो चुके हैं तथा बेरोजगारी चरम पर है ऐसी स्थिति में समय पर ऋण चुकाना मुश्किल है।

भारत की स्थिति

भारत में बढ़ता NPA बैंकों तथा सरकार के लिए परेशानी का कारण बनता जा रहा है। हाँलकी पिछले 2 वर्षों में इसमें थोड़ी गिरावट अवश्य आई है, कितु वर्तमान आँकड़े भी चिंताजनक है। रिजर्व बैंक द्वारा अर्द्धवार्षिक रूप से जारी किये जाने वाले वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के हालिया संस्करण में बताया गया है की मार्च 2021 तक कुल NPA 12.5 प्रतिशत तक होने की संभावना है, जिसमें सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी अधिक है। मार्च 2020 की बात करें तो यह 8.9 प्रतिशत था। NPA की इस अचानक वृद्धि का मुख्य कारण कोरोना महामारी को बताया गया है।

NPA के प्रभाव

NPA का विभिन्न क्षेत्रों यथा बैंकिंग क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र तथा सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में ही नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। ऐसे ही कुछ नकारात्मक प्रभाव निम्न हैं। 

  1. बैंकों को होने वाले लाभ में कमी आती है फलतः बैंकों के संसाधन सीमित होते हैं।
  2. बैंकों में साख की कमी होती है परिणामस्वरूप निवेश दर में कमी आती है तथा नए उद्योगों, स्टार्टअप्स आदि को ऋण लेने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
  3. निवेश दर के घटने से उत्पादन में कमी आती है तथा बेरोजगारी दर बढ़ती है।
  4. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में NPA के बढ़ने के कारण सरकार को बैंकों के लिए अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता पड़ती है जिससे जन कल्याणकारी योजनाओं में कमी आती है।

NPA कम करने के उपाय

NPA में कमी करने के लिए सरकार ने समय समय पर कई नीतियाँ बनाई हैं। उदाहरण के तौर पर सरफेसी एक्ट 2002 (यह कानून बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं को अधिकार देता है की वे ऋणी द्वारा ऋण न चुका पाने की स्थिति में उसकी संपत्तियों/परिसंपत्तियों को जब्त कर सकें), इंद्रधनुष अभियान (इसके तहत सरकारी बैंकों की कार्यकुशलता एवं प्रबंधन में सुधार कर उनके बढ़ते NPA को कम करने का लक्ष्य रखा गया है), इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) तथा 4R नीति, जिसके अंतर्गत NPA की समस्या से निपटने के लिए निम्न चार तरीके सुझाए गए हैं।

  1. Recognition (NPA की पहचान)
  2. Recapitalization (सरकार द्वारा अतिरिक्त पूँजी की व्यवस्था)
  3. Resolution (समाधान)
  4. Reforms (सुधार)

यह भी पढ़ें : महँगाई क्या है अथवा किस प्रकार उत्पन्न होती है?

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