Indian Judiciary system and its Functioning | भारतीय न्यायपालिका

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भारतीय न्याय व्यवस्था

भारत मुख्यतः तीन स्तंभों कार्यपालिका, विधायिका एव न्यायपालिका से मिलकर बना हुआ है। इन तीनों के कामकाज एक दूसरे से स्वतंत्र हैं, तथा प्रत्येक के पास कुछ विशेषाधिकार एवं शक्तियाँ हैं। हाँलाकि हमारा देश संघीय व्यवस्था पर चलता है अर्थात भारत अलग अलग राज्यों का एक संघ है किंतु भारत की न्याय व्यवस्था संघीय न होकर एकीकृत है, अतः भारत के किसी भी राज्य में निवास करने वाले नागरिक के लिए एक ही सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था है।

न्यायपालिका की संरचना

न्यायपालिका की संरचना से आशय विभिन्न स्तरों पर अलग अलग न्यायालयों से है। जो निम्न स्तरों पर कार्य करती है

  • सर्वोच्च न्यायालय
  • उच्च न्यायालय
  • जिला न्यायालय
  • ग्राम्य न्यायालय

ग्राम्य न्यायालय

न्याय व्यवस्था या न्यायपालिका की पहली इकाई ग्राम्य न्यायालय हैं। जो ग्राम स्तर के मामलों की सुनवाई कर नागरिकों को उनके द्वार पर न्याय उपलब्ध कराती है। इसकी शुरुआत ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के तहत की गई है। इसके अनुसार ग्राम न्यायालय प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट की अदालत होती है तथा न्यायालय की अध्यक्षता के लिए एक न्यायाधिकारी होता है। न्यायाधिकारी की नियुक्ति उच्च न्यायालय की सहमति द्वारा राज्य सरकारें करती हैं। इन न्यायालयों के पास फौजदारी तथा दीवानी दोनों प्रकार के मामलों की सुनवाई का अधिकार होता है।

जिला न्यायालय

न्यायपालिका में ग्राम न्यायालयों के ऊपर जिला अदालतें होती हैं जो जिला स्तर पर मामलों की सुनवाई करती हैं। संविधान में इनका उल्लेख अनुछेद 233 से 237 तक किया गया है। जिला न्यायालय का न्यायाधीश जिले का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति तथा पदोन्नति राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है। जिला न्यायालय सिविल एवं आपराधिक मामलों की सुनवाई कर सकता है तथा इसके फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। जिला न्यायाधीश किसी अपराधी को उम्रकैद से लेकर मृत्युदंड तक कि सज़ा सुना सकता है। गौरतलब है कि मृत्युदंड देने से पहले इस फैसले का राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदन होना आवश्यक होता है।

उच्च न्यायालय

जिला एवं अन्य अधीनस्थ न्यायालयों के ऊपर तथा किसी राज्य का शीर्ष न्यायालय, उच्च न्यायालय होता है। भारत में उच्च न्यायालयों का गठन सर्वप्रथम 1862 में किया गया जिसके अंतर्गत कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास उच्च न्यायालयों की स्थापना हुई। आज़ादी के बाद भारत के संविधान में प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है। किन्तु सातवें संविधान संशोधन 1956 के अनुसार संसद को यह अधिकार है कि वह दो या दो से अधिक राज्यों या किसी संघ शासित प्रदेश के लिए साझा उच्च न्यायालय स्थापित कर सके।

किसी उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीश होते हैं जिनकी संख्या समय समय पर राष्ट्रपति द्वारा आवश्यकता के अनुसार तय की जाती है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद की जाती है एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श द्वारा करता है। गौरतलब है कि यहाँ सर्वोच्च न्यायालय तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से आशय मुख्य न्यायाधीश तथा उपरोक्त न्यायालयों के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों के परामर्श से है।

उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता

कार्यपालिका के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रखने के लिए न्यायपालिका को आवश्यक स्वतंत्रता दी गयी है। जिसके अंतर्गत न्यायाधीशों के विशेषाधिकारों तथा न्यायालय की शक्तियों को सुरक्षा प्रदान की गई है। ऐसे कुछ महत्वपूर्ण अधिकार निम्न हैं।

  • इसके तहत संविधान द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति, ट्रांसफर, वेतन एवं भत्ते तथा कार्यकाल की सुरक्षा दी गयी है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की उम्र तक पद पर रहते है। उनको केवल संविधान में उल्लिखित विधि जिनमें सिद्ध कदाचार एवं अक्षमता शामिल हैं के आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है अन्यथा नहीं।
  • अगर वेतन,भत्ते, पेंशन, अवकाश तथा अन्य विशेषाधिकारों की बात करें तो इनमें संसद समय समय पर परिवर्तन अवश्य कर सकती है किंतु ऐसे किसी परिवर्तन द्वारा इन सुविधाओं में वित्तीय आपातकाल की स्थिति को छोड़कर अन्य किसी परिस्थितियों में कमी नहीं की जा सकती। सरल शब्दों में कहें तो संसद केवल वेतन, भत्ते तथा अन्य विशेषाधिकारों में बढ़ोत्तरी कर सकती है कमी नहीं।
  • किसी न्यायाधीश पर महाभियोग चलाए जाने के अतिरिक्त न्यायाधीशों के कार्य पर किसी राज्य विधानमंडल एवं संसद में चर्चा नहीं की जा सकती।
  • उच्च न्यायालय किसी भी व्यक्ति को अपनी अवमानना करने पर दंडित कर सकता है। इस प्रकार कोई उच्च न्यायालय अपनी गरिमा एवं प्राधिकार को बनाए रखता है।
  • कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचने के लिए संविधान उच्च न्यायालय को यह अधिकार देता है कि किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अपने न्यायालय में कर्मचारियों की नियुक्ति कर सके।
  • किसी भी परिस्थिति में संसद या राज्य विधानमंडल उच्च न्यायालय के न्यायिक शक्तियों जो संविधान में उल्लिखित हैं में कटौती नहीं कर सकते।

उच्च न्यायालय का न्याय क्षेत्र

राज्यों के उच्च न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र बहुत विस्तृत है अर्थात उच्च न्यायालयों को अपीलों की सुनवाई के अतिरिक्त अन्य कई अधिकार प्राप्त हैं जिनमे कुछ निम्न हैं।

  • उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह किसी मामले को बिना किसी अपील के अपने संज्ञान में लेते हुए सुनवाई करे।
  • यह एक अपीलीय न्यायालय है जहाँ इसके राज्यक्षेत्र में आने वाले अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध सुनवाई की जाती है। ऐसे मामले सिविल या आपराधिक कोई भी हो सकते हैं।
  • उच्च न्यायालय को नागरिकों के मूल अधिकारों एवं कुछ अन्य कानूनी अधिकारों को प्रवर्तित कराने के सम्बंध में न्यायादेश या रिट जारी करने का अधिकार है।
  • यह अपने अधीनस्थ न्यायालयों के पर्यवेक्षक के रूप में भी कार्य करता है और उन पर नियंत्रण करता है। जिसके अनुसार उच्च न्यायालय अपने किसी अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले को अपने पास मँगवा सकता है, अधीनस्थ न्यायालयों के लिए नियम तैयार और जारी कर सकता है
  • उच्च न्यायालय के पास एक अन्य महत्वपूर्ण शक्ति न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति है इसके अंतर्गत न्यायालय राज्य विधानमंडल या संसद के किसी कानून को यदि वे संविधान का उल्लंघन करते हों तो उन्हें निरस्त कर सकता है।
  • उच्च न्यायालय के किसी फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय

भारतीय न्यायपालिका के शीर्ष में भारत का सर्वोच्च न्यायालय है। भारत के सभी उच्च न्यायालय इसके अधीन हैं अर्थात यह भारत का अंतिम अपीलीय न्यायालय है। इसके फैसले को कहीं भी चुनौती नहीं दी जा सकती। संविधान में अनुच्छेद 124 से 147 तक सर्वोच्च न्यायालय का उल्लेख किया गया है। वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 31 न्यायाधीश हैं। 1993 में दूसरे न्यायाधीश मामले का फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने यह व्यवस्था की, कि उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश को ही मुख्य न्यायाधीश के रूप में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा। तथा अन्य न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश तथा 4 अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों जिसे कॉलेजियम कहा जाता है, की सलाह पर करेगा।

Supreme Court of India
Indian Judiciary system and its Functioning | Photo By: Wikipedia        

सर्वोच्च न्यायालय की स्वतंत्रता

संविधान ने कार्यपालिका के अतिक्रमण, दबाव या हस्तक्षेप से बचाने तथा बिना पक्षपात किये फैसले सुनाने के लिए उच्च न्यायालय की तरह उच्चतम न्यायालय को भी लगभग हर क्षेत्र में स्वतंत्रता प्रदान की है। चाहे वह न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर हो, न्यायाधीशों को दी जाने वाली सुविधाएं, कार्यकाल या उनके विशेषाधिकार हो, न्यायाधीशों के आचरण पर बहस हो या अपने कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार हो।

सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक शक्तियाँ

उच्च न्यायालयों की तरह सर्वोच्च न्यायालय को भी संविधान द्वारा व्यापक अधिकार प्रदान हैं। 

  • उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार है कि वह किसी मामले को बिना किसी अपील के अपने संज्ञान में लेते हुए सुनवाई करे।
  • उच्चतम न्यायालय को निम्न क्षेत्रों में अपीलीय अधिकार प्राप्त हैं
    • संविधानिक मामलों में अपील
    • दीवानी मामलों में अपील
    • आपराधिक मामलों में अपील
    • विशेष अनुमति द्वारा अपील
  • उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति को किसी सार्वजनिक महत्व के मामले में या कुछ विशेष मामलों जैसे कोई संविधानिक संधि, समझौते, आदि पर राष्ट्रपति द्वारा माँगे जाने पर सलाह देता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय केंद्र या राज्य के किसी भी विधायी या कार्यकारी आदेश की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है तथा ऐसे आदेश या कानून यदि संविधान के खिलाफ हों तो उन्हें निरस्त कर सकता है।
  • उच्चतम न्यायालय किसी नागरिक के मूल अधिकारों के हनन होने की स्थिति में न्यायादेश या रिट जारी करता है तथा उसके मूल अधिकारों को प्रवर्तित करता है।

 

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