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प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय सेना की भूमिका (India in First World War)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका जानकारी ज़ोन में जहाँ हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन कमाई तथा यात्रा एवं पर्यटन जैसे क्षेत्रों से महत्वपूर्ण तथा रोचक जानकारी आप तक लेकर आते हैं। आज इस लेख में हम नज़र डालेंगे प्रथम विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका पर (India in First World War) और जानेंगे इस युद्ध में शामिल हुए कुछ ऐसे भारतीय जाबांज़ सैनिकों के बारे में, जिनके जीवन के विषय में अधिकांश लोगों को कम जानकारी है।

प्रथम विश्वयुद्ध (First World War)

प्रथम विश्वयुद्ध के बारे में हम सभी ने इतिहास में पढ़ा हैं। हालाँकि 20वीं सदी के पूर्व भी विश्व में कई बड़े युद्ध लड़े गए, किन्तु 20वीं सदी के शुरुआत में हुआ यह युद्ध सबसे भयानक था, जिसने पूरी दुनियाँ को दो गुटों में बाँट दिया। 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 के बीच लड़े गए इस युद्ध में जर्मनी तथा उसके सहयोगी देशों को हार का सामना करना पड़ा तथा उन पर कई अपमानजनक संधियाँ थोपी गईं।

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प्रथम विश्व युद्ध के बारे में सोचने पर अक्सर हमारे दिमाग में यूरोपीय शक्तियों का ही विचार आता है, किन्तु प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस तथा अमेरिका) की विजय के पीछे भारत का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अगर यह कहा जाए कि, युद्ध के बाद विश्व में ब्रिटेन का वर्चस्व बढ़ाने में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि, यदि भारत ब्रिटेन के पक्ष में युद्ध नहीं लड़ता तो प्रथम विश्वयुद्ध के परिणाम भिन्न हो सकते थे। भारत ने दुनियाँ के अलग-अलग मोर्चों पर ब्रिटेन के पक्ष में पूरी वीरता के साथ युद्ध लड़ा, जिसमें अंग्रेजों के लिए लड़ने वाला हर छटा सैनिक भारतीय था।

युद्ध में भारत की भूमिका (India in First World War)

प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत के समय भारत ब्रिटेन का एक उपनिवेश था अतः भारत के लिए युद्ध में शामिल होना आवश्यक हो गया। भारत भौगोलिक रूप से भी बड़ा देश था अतः अंग्रेजों ने युद्ध में भारत के संसाधनों का भरपूर लाभ लिया। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भारत को युद्ध की समाप्ति के बाद स्वाधीन किये जाने का आश्वासन दिया गया हालाँकि इसे ब्रिटेन ने युद्ध के बाद पूरा नहीं किया, बल्कि रौलट एक्ट जैसे कानून लोगों पर थोपे गए तथा जलियांवाला बाग जैसा भीषण हत्याकांड हुआ।

भारतीय सेना में उच्च पदों पर अंग्रेज अधिकारी शामिल थे, जबकि अधिकांश सिपाही भारतीय थे। इस युद्ध में अविभाजित भारत (वर्तमान बर्मा, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश) से तकरीबन 11 लाख सैनिकों ने भाग लिया जिनमें वर्तमान भारत के सैनिकों की संख्या 10 लाख थी। युद्ध में सेना के अतिरिक्त भारत से अन्य संसाधनों का भी इस्तेमाल किया गया। उदाहरण के तौर पर तकरीबन 2 लाख मवेशी भारत से बाहर भेजे गए जिनमें घोड़े, खच्चर तथा दुधारू जानवर शामिल थे।

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भारतीय सेना का युद्ध में प्रवेश

जून 1914 में ऑस्ट्रिया के राजकुमार फर्डिनेंड की हत्या के साथ ऑस्ट्रिया तथा सर्बिया के मध्य युद्ध की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे सभी देश अपने अपने सहयोगी देशों की तरफ से युद्ध में कूदने लगे। ब्रिटिश भारतीय सेना का इस युद्ध में प्रवेश सितंबर 1914 में तुर्की स्थित एक निजी तेल कंपनी एंग्लो-पर्सियन का संरक्षण करने तथा एक भारतीय सैन्य दल को यूरोप भेजने से हुआ। ब्रिटिश सरकार सेना की ईंधन की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए तुर्की स्थित इस तेल कंपनी को खरीदना चाहती थी।

तुर्की को यह सूचना मिलने पर उसने सेना एकत्रित करना शुरू कर दिया तत्पश्चात ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सेना के एक अभियान बल D को इन तेल क्षेत्रों की सुरक्षा करने के लिए अक्टूबर 1914 में समुद्री मार्ग से बहरीन के लिए रवाना किया गया। इसके अतिरिक्त एक अन्य सैन्य दस्ता अभियान बल A को जवानों की माँग के जवाब में यूरोप भेजा गया। भारतीय सैनिकों ने यूरोप, पूर्वी अफ्रीका तथा मध्य पूर्व आदि स्थानों पर ब्रिटेन के पक्ष में युद्ध लड़ा। भारत से 7 अभियान बलों को विदेश में विभिन्न मोर्चों पर भेजा गया। 

विभिन्न अभियान बल

अभियान बल A जिसका हमने ऊपर जिक्र किया है को सितंबर 1914 के आखिर में यूरोप भेजा गया यूरोप में भारतीय सैनिकों ने फ्रांसीसी सेना के साथ मिलकर जर्मनी के खिलाफ ला बैसी तथा नव शपैल की लड़ाई में भाग लिया। अभियान बल B को पूर्वी अफ्रीका में जर्मन सेना से लड़ने के लिए भेजा गया। टोंगा की लड़ाई में यही अभियान बल शामिल था। अभियान बल C भी पूर्वी अफ्रीका में जर्मनी के खिलाफ युद्ध के लिए भेजा गया इसका मुख्य उद्देश्य युगांडा रेलवे तथा संचार तंत्र की निगरानी करना था।

अभियान बल D जैसा कि, हमने ऊपर बताया है मध्य पूर्व (मेसोपोटामिया) में तैनात किया गया, जिसने तुर्की के साथ युद्ध किया। अभियान बल E को फिलिस्तीन में सेवा के लिए भेजा गया। अभियान बल F को मिस्र में स्वेज नहर की सुरक्षा हेतु भेजा गया तथा अभियान बल G का गठन 1915 में गैलिपोली अभियान को मजबूत करने के लिए किया गया। इसमें शामिल सैनिक अभियान बल F के तहत मिस्र में तैनात सैनिक थे, जिन्हें बाद में यूरोप बुला लिया गया।

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युद्ध के बाद सम्मानित सैनिक

प्रथम विश्वयुद्ध में तकरीबन 74,000 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि घायल होने वाले सैनिकों की संख्या 66,000 से अधिक थी। इस युद्ध में जिस प्रकार भारतीय सैनिकों ने संसाधनों की कमी के बावजूद वीरता का परिचय देते हुए ब्रिटेन की स्थिति मजबूत की उसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि, ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सैनिकों को सम्मान के तौर पर विक्टोरिया क्रॉस देने का फैसला लिया गया।

यह ब्रिटिश सैनिकों को युद्ध के दौरान वीरता के लिए मिलने वाला सबसे बड़ा सम्मान है। इससे पूर्व तक भारतीय सैनिकों को सबसे बड़े सम्मान के रूप में केवल इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट से नवाजा जाता था। युद्ध के बाद 11 भारतीय सैनिकों को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया। इस सम्मान को प्राप्त करने वाले पहले सैनिक खुदादद खान थे। इनके अतिरिक्त दरवान सिंह नेगी, गब्बर सिंह नेगी, चट्टा सिंह, मीर दस्त, कुलबीर थापा, नायक लाला, शाहमद खान, गोबिंद सिंह, करणबहादुर राणा, बदलू सिंह शामिल थे।

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शहीदों की याद में बने स्मारक

प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में भारत समेत दुनियाँ भर में स्मारक तथा संग्रहालय बनाए गए हैं। दिल्ली में बना इंडिया गेट इसी युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया। इसके अतिरिक्त अमेरिका के कंसास शहर में बना संग्रहालय, ब्रिटेन में बना छतरी स्मारक, फ्रांस के नव शपैल में बना स्मारक, बेल्जियम के येप्रेस में युद्ध में लापता हुए सैनिकों की याद में बना स्मारक मेनिन गेट मेमोरियल प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद भारतीय एवं अन्य सैनिकों की याद दिलाता है।

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