जानें क्यों रुपया, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहा है तथा किस प्रकार तय होती है USD/INR विनिमय दर?

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पिछले कुछ महीनों से भारतीय रुपया, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमज़ोर होता जा रहा है। मौजूदा विनिमय दर की बात करें तो यह 80.02 रुपये प्रति डॉलर है। अमेरिकी डॉलर की तुलना में दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होते रुपये के कारण यह हालिया दौर में चर्चा का विषय बना हुआ है। आज इस लेख में आसान भाषा में समझने का प्रयास करेंगे कैसे डॉलर तथा रुपये की विनिमय दर का निर्धारण किया जाता है और क्यों वर्तमान स्थिति में भारतीय रुपये में डॉलर की तुलना में इतनी गिरावट देखी जा रही है।

क्यों डॉलर के मुकाबले गिरता है रुपया?

अर्थव्यवस्था में माँग और आपूर्ति (Demand & Supply) का नियम एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। किसी उत्पाद की आपूर्ति से अधिक माँग उसकी कीमतों में वृद्धि करती है, जबकि माँग से अधिक आपूर्ति उत्पाद की कीमतों में गिरावट का कारण बनती है। डॉलर और रुपये की विनिमय दर भी इसी नियम के तहत विनियमित होती है। वर्तमान दौर में अमेरिकी डॉलर एक वैश्विक मुद्रा है, लगभग सभी देशों को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अथवा विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में डॉलर की आवश्यकता होती है।

वैश्विक मुद्रा होने के चलते डॉलर की माँग मुद्रा बाज़ार में हमेशा बनी रहती है। हालाँकि प्रत्येक देश अपने निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित भी करता है, किन्तु जिस देश में यह आय उसके खर्च की तुलना में कम हो, उसे बाज़ार से विदेशी मुद्रा खरीदनी पड़ती है और यदि ऐसे देश की घरेलू मुद्रा की माँग कम हो तो उसकी मुद्रा का मूल्य कम हो जाता है।

भारत की बात करें तो इसका विदेशी मुद्रा में सबसे बड़ा खर्च कच्चे तेल का आयात है आंकड़ों के अनुसार भारत ने वित्त वर्ष 2021-2022 में लगभग 120 बिलियन डॉलर का कच्चा तेल आयात किया। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य बड़े आयात, जिनके लिए देश को विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है निम्नलिखित हैं।

  • रत्न, कीमती धातुएँ
  • इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी, उपकरण
  • कंप्यूटर मशीनरी
  • कार्बनिक रसायन
  • प्लास्टिक एवं प्लास्टिक की वस्तुएं

एतिहासिक पृष्ठभूमि

डॉलर के वैश्विक मुद्रा बनने की शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुई, जब लगभग सभी यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी थी। चूँकि अमेरिका एक मात्र देश था, जो इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हुआ था अतः युद्ध के पश्चात केवल अमेरिका ही आर्थिक रूप से स्थिर था।

पश्चिम में फैले इस आर्थिक असंतुलन को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक स्थिरता लाने हेतु एक मौद्रिक नीति की आवश्यकता महसूस हुई, लिहाज़ा 1944 में अमेरिका के ब्रिटेन वुड में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें 44 देशों के 700 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन में ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक जैसे संस्थानों की शुरुआत करने का फैसला भी लिया गया।

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अमेरिकी मुद्रा की स्थिरता को देखते हुए उसे सोने के साथ सम्बद्ध (1 डॉलर = 0.88 ग्राम सोना) कर दिया गया और विभिन्न देशों की मुद्राओं की भी डॉलर के साथ विनिमय दर निर्धारित की गई। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के लिए नए बैंक नोट छापने हेतु यह अनिवार्य किया गया कि, उसके पास प्रति डॉलर 0.88 ग्राम सोना रिजर्व में मौजूद हो। भारत की बात करें तो रिजर्व बैंक लिए एक रुपया छापने की एवज में 0.26 ग्राम सोना या 0.30 डॉलर रिजर्व में रखना अनिवार्य किया गया।

देश की आजादी के बाद रुपये की कीमत

1947 में देश आजाद हुआ, चूँकि ब्रिटेन वुड समझौते में भारत भी शामिल था अतः उसने आजादी के बाद भी विनिमय दर की पुरानी व्यवस्था जारी रखी, इसके अनुसार एक डॉलर तकरीबन 4.76 रुपये के बराबर था। भारत जब आजाद हुआ, तब भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खराब थी। कल्याणकारी तथा विकास गतिविधियों को वित्तपोषित करने हेतु, विशेष रूप से 1951 में शुरू की गई पंचवर्षीय योजना के लिए भारत सरकार ने इस दशक में विदेशी तथा निजी क्षेत्र से लगातार पैसा उधार लिया। विदेशी कर्ज के अलावा भारत विदेशी आर्थिक सहायता पर भी बहुत हद तक निर्भर था।

पहले से खराब देश की अर्थव्यवस्था को 1960 के दशक में कई बड़े झटके लगे, जिनमें 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1965 में अमेरिका द्वारा आर्थिक सहायता पर रोक लगा देना प्रमुख थे इसके अतिरक्त इस दौर में पड़े सूखे के चलते देश में कृषि पैदावार भी अपने न्यूनतम स्तर पर चली गई। विश्व बैंक द्वारा आर्थिक सहायता बहाल करने की एवज में भारत के सामने रुपये के अवमूल्यन की शर्त रखी।

खाली होते विदेशी मुद्रा भंडार, बढ़ती महँगाई, भुखमरी, भुगतान संतुलन घाटे के चलते जून 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले कम करने का फैसला लिया, जिसका देश में कड़ा विरोध भी हुआ। इस समय तक एक डॉलर की कीमत 4.76 रुपये थी, जो अब 57% घट कर 7.50 रुपये हो गई। रुपये के अवमूल्यन के चलते निर्यात सस्ता हो गया और आयात महँगा, निर्यात के सस्ते होने से देश में विदेशी मुद्रा के प्रवाह में कुछ हद तक वृद्धि हुई।

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मुद्रा के अवमूल्यन का आयात-निर्यात पर प्रभाव

कई देश घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन अपने निर्यात को बढ़ाने के उद्देश्य से करते हैं, जिनमें चीन एक प्रमुख देश है। ऐसा कैसे होता है आइए इसे एक उदाहरण की सहायता से समझने का प्रयत्न करते हैं, मान लें आप कोई उत्पाद बनाने के लिए चीन से कच्चे माल का आयात करते हैं और इसकी लागत 1000 डॉलर (6700 युआन) है।

अब यदि चीन डॉलर के मुकाबले अपनी घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन करता है तो आप 1000 डॉलर के बदले पहले की तुलना में अधिक युआन खरीद पाएंगे लिहाज़ा पहले की तुलना में कच्चे माल की लागत भी आपके लिए कम हो जाएगी। हालाँकि जहाँ अवमूल्यन देश के निर्यात को बढ़ाता है वहीं यह आयात को महँगा भी कर देता है।

1971 से 1990 के मध्य विनिमय दर

समय के साथ अमेरिकी सरकार ने ब्रिटेन वुड समझौते की शर्तों का उल्लंघन करना शुरू किया और साल 1971 में ब्रिटेन वुड समझौता समाप्त हो गया, इसके परिणामस्वरूप डॉलर की कीमत जमीन पर आ गिरी। हालाँकि अमेरिका की कूटनीति के चलते डॉलर एक बार फिर खड़ा हुआ, जब अमेरिका ने अरब देशों पर तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में करने का दबाव बनाया।

1971 के बाद से भारत नें निश्चित विनिमय दर (Fixed Exchanged Rate) को अपनाया तथा 1975 तक किसी प्रकार की अस्थिरता से बचने के लिए रुपये को विभिन्न देशों की मुद्राओं के साथ समग्र रूप से सम्बद्ध कर दिया ताकि किसी एक मुद्रा के प्रभावित होने से रुपये की कीमत पर प्रभाव ना पड़े।

1973 में अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OAPEC) ने कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती करने का फैसला किया फलस्वरूप तेल आयात बिल बढ़ गया। चूँकि अरब देश तेल का व्यापार डॉलर में कर रहे थे अतः इस आयात बिल का भुगतान करने के लिए भारत ने विदेशी मुद्रा उधार ली, जिससे भारतीय मुद्रा का मूल्य और कम हुआ। साल 1884 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशियों का विश्वास कम किया। इन सभी कारणों से डॉलर की विनिमय दर 1990 आते-आते 17.50 रुपये हो गई।

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1991 का आर्थिक संकट एवं रुपया

साल 1991 में भारत एक भीषण आर्थिक संकट की चपेट में आया, देश का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 7.8% हो चुका था, सरकार के कुल राजस्व संग्रह का 39% केवल कर्ज के ब्याज के रूप में जा रहा था। चालू खाता घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद का 3.69% था और WPI मुद्रास्फीति लगभग 14% पर थी। भारत इस स्थिति में पहुँच चुका था कि, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा उसे डिफॉल्टर घोषित किया जा सकता था।

इस आर्थिक संकट के मुख्य कारणों में देश की संरक्षणवादी आर्थिक नीति तथा गल्फ वॉर के चलते आसमान छूते तेल के दाम थे। आर्थिक संकट से निपटने के लिए सरकार ने कई आर्थिक सुधार किए, जिनमें एलपीजी मॉडल (Liberalization, Privatization & Globalization) प्रमुख था। इसके साथ ही सरकार ने भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन भी किया और 1993 में रुपये तथा डॉलर की विनिमय दर को बाज़ार पर छोड़ दिया।

जहाँ अभी तक डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत सरकार तय किया करती थी अब उसे माँग एवं आपूर्ति के आधार पर बाजार के अधीन कर दिया गया और तब से अब तक यही व्यवस्था जारी है। हालाँकि यह पूर्णतः बाजार पर निर्भर भी नहीं है, बल्कि विनिमय दर में आवश्यकता से अधिक विचलन की स्थिति में रिजर्व बैंक हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये की कीमत में स्थिरता बनी रहे।

चूँकि यह Fixed Exchange Rate तथा Floating Exchange Rate के बीच की व्यवस्था है अतः इसे Managed Exchange Rate कहा जाता है। भारत की कच्चे तेल के लिए अरब देशों पर निर्भरता तथा निर्यात की तुलना में अधिक आयात के चलते देश को हमेशा विदेशी मुद्रा की आवश्यकता रही है और समय के साथ रुपया डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होता रहा है।

वर्तमान परिदृश्य

वर्तमान में रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर 80.16 को छू चुकी है। रुपये में आई इस हालिया गिरावट के मुख्य कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल के दामों में बढ़ोत्तरी तथा विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाज़ार से पैसे की निकासी हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने इस साल अब तक 28.4 बिलियन डॉलर के शेयर तथा 2.3 बिलियन डॉलर के बॉन्ड बेचकर भारतीय अर्थव्यवस्था से अपना पैसा निकाला है।

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